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टिहरी से प्रतापनगर तक गूंजे जनता के सवाल, पत्रकारिता की भूमिका पर उठे सवाल ।

Pahado Ki Goonj

टिहरी से प्रतापनगर तक गूंजे जनता के सवाल, पत्रकारिता की भूमिका पर उठे सवाल ।

टिहरी गढ़वाल। टिहरी बांध प्रभावित क्षेत्रों से लेकर प्रतापनगर तक सड़क, स्वास्थ्य, आवागमन और मूलभूत सुविधाओं को लेकर जनता लंबे समय से संघर्ष करती रही है। इन्हीं जनसरोकारों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘पहाड़ों की गूंज’ के संपादक जीतमणि पैन्यूली ने पत्रकारिता की भूमिका और मीडिया की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
पैन्यूली का कहना है कि पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि जनता के सवालों को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगना है। उन्होंने प्रतापनगर में हुए आंदोलनों और चक्का जाम का हवाला देते हुए स्थानीय मीडिया की भूमिका पर भी आत्ममंथन की जरूरत बताई।
उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं, सड़क और विस्थापन जैसे मुद्दों को पहाड़ के गंभीर जनसरोकार बताते हुए कहा कि जब जनता अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरती है तो उसकी आवाज को प्रमुखता से सामने लाना मीडिया की जिम्मेदारी है।
डिजिटल पत्रकारिता और सोशल मीडिया को जनआवाज का मजबूत माध्यम बताते हुए उन्होंने पत्रकारों के अधिकार, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी उठाया। उनका कहना है कि निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
2. “सत्ता से नहीं, जनता से हो पत्रकारिता की जवाबदेही” — टिहरी में उठी चौथे स्तंभ की कसौटी पर बहस

क्या मीडिया आम आदमी की आवाज बन रहा है? टिहरी गढ़वाल और प्रतापनगर की जनसमस्याओं के बीच यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है। वरिष्ठ पत्रकार जीतमणि पैन्यूली ने सड़क, स्वास्थ्य, विस्थापन और जनआंदोलनों को लेकर मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।
उनका कहना है कि जनता के पैसे से चलने वाली व्यवस्थाओं पर सवाल पूछना किसी व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र का हिस्सा है। जिला पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद तक जनप्रतिनिधियों से जनता के सवालों का जवाब मांगना पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
प्रतापनगर में पूर्व में हुए चक्का जाम और आंदोलनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्थानीय मुद्दों को पर्याप्त मीडिया स्थान नहीं मिलना गंभीर आत्ममंथन का विषय है। उनका जोर डिजिटल मीडिया के जरिए गांव-गांव की आवाज को व्यापक मंच देने पर भी रहा।
पैन्यूली ने पत्रकारों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा के साथ ही अन्य सामाजिक मुद्दों को लेकर अपनी सक्रियता का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारिता की असली परीक्षा सत्ता के साथ खड़े होने में नहीं, बल्कि कमजोर की आवाज बनने में है।
3. बांध की पीड़ा से पत्रकारिता के सवाल तक: प्रतापनगर में फिर उठी जनता की आवाज
टिहरी गढ़वाल। टिहरी बांध से प्रभावित क्षेत्र आज भी सड़क, स्वास्थ्य और आवागमन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। प्रतापनगर की इन्हीं समस्याओं के बीच अब सवाल सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि जनता की आवाज को मीडिया कितनी मजबूती से उठाता है, इसका भी है।
‘पहाड़ों की गूंज’ के संपादक जीतमणि पैन्यूली ने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी व्यक्ति की छवि चमकाना नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगना होना चाहिए। उन्होंने प्रतापनगर के पुराने जनआंदोलनों और चक्का जाम का उल्लेख करते हुए स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका पर सवाल उठाए।
स्वास्थ्य व्यवस्था का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहाड़ में यदि किसी गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़े तो यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है।
पैन्यूली ने डिजिटल मीडिया को पहाड़ के गांवों की आवाज को दूर तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बताया। साथ ही पत्रकारों के अधिकार, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया।

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