सग्वाडा की काखड़ी-राकेश मोहन थपलियाल

Pahado Ki Goonj

सग्वाडा की काखड़ी : राकेश मोहन थपलियाल,मुंबई.
काखड़ी खांण कु, सौंणी कु भारी ज्यू थौ बोळणु ? परसी जलमु न भी मांगी थै, “ उण दिदौं बल त्यूं काखड्यों सणी ” पर वींन सफा मना करदिनी . अब परसेक ससुराजी की तीथ ,वैका हिका दिन जलमु का बुबा की तीथ, स्या पितरु क धरीं वींकी, नई नवांण की चीज . दुई चार गोदड़ी अर मुंगरी भी धरीं थै वींकी लुकैक,चला बामण भी खुश व्हे जालु . मुंगरी सुकीं छन, पर कख मिलदिन ? अर , जी होर भारी शौक़ीन था मुंगरयों का . सौंण- भादों लगी नी कि, बुढय्या मुंगराड़यों रंदु थौ डाल्यों अरकोंणों-फरकोंणों अर जलमु कु बुबा भी लग्लों –लगलों रंदु थौ खोजण पर लग्युं . “ हलो , नि करा रांडी –मुंडी तौं डालों की, व बौंड बिटी भटयांदी रंदि थै, पर दैव की माया ,कु सुंणदु थौ. कना दिन था भाग्यानी का, सि ?

बाड़ी –सग्वाड़ी त तनि रै नी पर भुज्जी –भाज्जी ह्वेजांदी थै,थोड़ा भौत . करेला ,लामेंडा, मर्च ,गोदड़ी, पिंडालु, एक –दुई भट्टों का डाला अर इच्छी किनारा पर दुई –चार डाली मुंगरयों की अर एकाध लग्लु काखड़ी कु . एक त माच्दु का कुखड़ा कना , भलु जु एक डाली भी पंगर्रन दयोंन . अर पता नी कै सोच म हिटदा- हिटदा वा डाला मति फरकेंदा- फरकेंदा बची. वींन अपड़ी काक दृष्टी ,काखड़ी का लगला पर उब्बु बिटि ,उद्दु तक घुमाई पर काखड़ी कु कखी नाम –निशान नि पाई, दुई –चार बखत, लगला उंडा –फंडा भी फरकायेन पर दैब की दैव .हाटफेल होंदु –होंदु बची वींकु अर ठेठ बरमंड आग पहुँचगी. “ हे रांडू, कनु मुर्दा मरी तुमारु, अरे चुल्ला पर भड़येक खा त्युं छोरों सणी. उस्येक –उस्येक खा रांडु त्यों सणी, भगवान करू निरजड़ी हो माच्दु की ,हैजा आऊ, बजर पडु माच्दु की कुड़ी पर ,कुई कत्त नि रौ माच्दु कु अर मवासी घाम लग जाऊ ”. हल्ला सुणिक,कई जनानी अर मंणस्यारा लग्गी था हेरंण पर कैकु सांसु नि थौ पुछणु कु . तनी भी सब चितैगी था कि, क्या ह्वे होलु ? दुई –चारुन अपणा नौन्यालु सणि पुछी भी , “ अबे ,त्वेन त नि तोड़ी ”? ना बाबाजी ,मैंन किले तोड्न थै , न बै मै त ब्याखन थौ भि नि यख फंडु.

गाल्यों सुणीक सबु तैं किलकिली थै लगणी पर करूंन क्या ? जैकु नुकसान होलु वैन त बोलण ही ? पर संगरांदी-मासांती का दिन यनि लगदि-टुटदी गाळी अर व भी रुम्की दौं ? हे प्रभु रक्षा कर, न हो रांड की हाक –टोक लग जाऊ ? परसी एक जीप कनि फरकेंणि आगराखाल का बिड़वाल अर कईयों की मवासी घाम लग्गी . रांड –मुंडों की त गाली भी पटाक लगदी पर यूँ छोरों कु समझाऊ? खांण माचु अपणु लग्यां अर गाली लुकारी खाणा. हत्त्त तेरा की . अर जब बरड़े-बरडेक सौंणी कु गिच्चु थकगी, तब आई व सगवाड़ा बिटि उब्बु. “ ज्वानि टुटू माच्दु की ”,बरड़ोट चालु थौ पर हल्ला कम व्हेगी थौ.

क्य व्हे बड़ी, प्रेमु का नौन्याल न पुछी . वीन कुई जबाब नि दिनी अर लगी तिबारी मति जांण. बडी ठकुराणी, हमुन नि तोड़ी लो. त बेटा तेरा किलै नाक लगणी ? ना बड़ी, मैं त बतोंण लग्युं . नी खांण पाऊ बुबा हैकी दां की काखड़ी –मुंगरी. ये गौं कु कनु मुर्दा मरयूं, केक रण कैकी चीज डाला-बुर्दों पर . मै देख्दु थौ त ढुंगा- ढुंगा न ,इनु कच्योंदु थौ कि, घेत लग जांदी माच्दु की . अब क्या खांण पितरु न, त्योंका हाड़का ? सच्चा पितर देवता होला त एक न पचु माच्दु तैं .

घडेक म जलमु भी ऐगी गौं बिटि. देखी त डिंडयाला म उजालु भी नी .बई कख गै होलि ? देखि त भितर थै पड़ीं .क्य व्हे, जू नखरु, वैन पुछी ? अर लम्पु भी नी अजौं बाल्युं ? तन्नि सुद्दी पड्यों. अर क्य व्हे, बामण न क्या बोलि ? अफु औंदु वु ग्यारा –बारा बजी .मै ,तब जौलु कुमाली . ये साल ,जब फौरम परेबेट भरन त दुई –चार मैना, माडू कौंकी की गाड़ी पर लगदौं कलेंडर, कुछ खर्चा –पाणी ही सही ? न रंदु मेरा लुंड –मुंडु की संगत म, त इनि नौबत ,किले औंण थै ? लुकारा छोरा ग्यारां म गैन, मै रांड कु कपाल इन्नी फुटी . लोग बिचारा, मास्टर बणला, पटवारी बंणला, तु इन्नी रै डबखाणु .अब छोड़ मार गोळी,रोट्टी नि बणोंदी आज, भारी भूक लगीं ? अब सैडा चौमासा तौं गोदड्यों खैक थकग्यों, आज कुछ हैक्कु साग कर पर आल्लु भी न बणे.

अरे, त्वे भी मालुम, सग्वाड़ा मंगकि मुंगरी अर काखड़ी कैन तोड़ी होलि, बई न पुछी ? सुद्दी नि बोल्दा कि, आज काखड़ी अर भोळ बाखरी ? यना चोर माच्द ये गौं भरयां . अब फंड फुक माँ, जु व्हेगी स्यु व्हेगी. यनु सोच बाबा होरून खयालि काखड़ी. तनी भी त बामणन ही खांण थै, हमारा हाथ यनि नि लगण थै?

यनु किलै बोल्दु छोरा, तु क्या जांणदु दीन –धरम ? अचकालु का छोरा, दुई आखर क्या पढ्या कि, सुद्दी रंदा फुर्चटैन्ट बणयां . तुमारा दौं त, न त कैन मुंडेण, न बई –बुबा कु सराध कर्रन ,हमारा जुगता जू, जु व्हेगी स्यु व्हेगी ? जा खुटा –हाथ धो,तबरेक मै रोट्टी अर पिंडालु

तबरेक ही कुड़ा का पैथर बिटिन आवाज आई अर जलमु न मारी लम्फाली . सौंणी भटयांदी रैगी पर वैन बोलि अब्बी औंदु दुई मिनट म .क्या बे हौंस्यारू केक आई तु अर स्वांरु कख ? वु जौहरी दा का सग्वाडा घुस्युं अर दुई हैंसण लगिन . अबे तेरी बै न पटकेक गाळी दिनिन, कनु मुरदा मरी हमारू, कनि चोरी हमुन तुमारी काखड़ी अर लगिन दुई हंसण .तबरेक स्वांरु भी ऐगी .कपड़ों पर माटू लग्युं ,हाथु पर चिराड़ा- बुराड़ा अर सांस धौंकणी की तरों .अबे क्या व्हे, जलमु न पुछी ? अबे कुई ऐगी थौ अर मैं इनु भाग्यों कि, दुई –तीन दां फरके भी रयों. अबे टी क्या यनि चोरी ही पड़ीं ,मरदु माचु काखड़ी बगैर ? अर बेटा तुमन नि खांण ? मुंड –कपाळ करूँ मै अर खांदी बखत, इच्छी हौर दी ? ल्यो बीड़ी पिलो .

अबे जलमु, परसी क्या व्हे , मै ब्याखन बाबा बुलोंण गोविंदु कौंका डेरा गई . वख तेरु बुबा ,मासांतु बड़ा,रामु मास्टर ,तोता भैजी, कई था बैठ्याँ अर दारु पेंणा था . अर पता ,क्या छुईं था लगाणा , इस्कुलु का दिनु की. अबे वु भी इन्नी चोरदा था,काखड़ी ,मुंगरी, लिंबू अर आम की दाणी .यीं तैं त बोल्दान छोरवाती ? तभी त जब कुई जनानी गाळी देंदी, मरद कुछ नि बोल्दा. नौना सब यन्नी होंदान बे .मांगिक अर अपणा डाला परंन तोडिक खांण म वु मजा नी ,जु चोरिक खाणंम छ .अबे बडा थौ बोल्नु , वु त कुखड़ा भी चोरदा था अर डोखरों खांदा था भड्येक. एक दां ऊंन पिपलेत कौंकु बाखरू भी चोरी थौ अर बंण लीगी था अर वैकी शिकार सुंदरु कौंकी छानि म पकाई . अबे त्वे कनै पता ? मैंन चोरिक सुणी ऊंकी छुईं.

एकदां, कुजणी पट्टी का गौं उद्खंडा अर चौंपावाला स्कुल्यों की व्हे लड़ाई, उन उंका बस्ता लुके दिनि था. गुरूजी न कई बखत पुछी पर कैन कुछ नि बताई, मार खैक उल्लर उठगिन शरील पर ,पर पट्ठोंन जुबान नि खोलि ? तब व्हे मुंड फोड़ाई अर कई बरमंड फुटिंन .
चल बे एक –द्वी सोड़ हौर दि ,अब जांदौं . बई न आज रोट्टी नि देणिन,तन्नि वीं गुस्सा चढ़यूँ, जलमु न बोलि. अबे ,तेरा बुबा न खांण थै काखड़ी स्या वैका बदला ,त्वेन ख़याली,बामण कु बांटु हमुन ख़याली, व्हेगी बात .अबे वु टी अच्छु कि, हमन त्वेक नि बोलि काखड़ी –मुंगरी तोड़नक् ,नितर तेरी बै की गाळी ,त्वे पर ही लगण थै ? जा फंडू जा डेरा,हम भी जादां,बतेरू अंधयारु व्हेगी, हौंस्यारू न बोली .

जलमु की माँ न पुछी ,कख थौ टोटक्यां पड़यूँ ? नि पेलु यूं बिड्यों ,कनि बास औणी दुरु बिटि ? कनु मुर्दा मरि तौं छोरों कु ? हौर पी बेटा अर लगौ जुकड़ा पर डाम .मै रांड कि किले सुणन कैन. अबे छोरा न बिगड़ कुसंगति म ,भली चीज खा दौं बळ . क्या खांण बई, काखड़ी –मुंगरी ? अरे छोरा यूँ बिड्यों का बाना त्वेन इस्कूल छोड़ी. लोग पढ़णा रैन अर तु बिटटों रै लुक्युं ,कोप्चों –कोपचों रै बैठयूँ . सुद्दी थान गुरूजी बोल्ना कि यु स्कूल नि औंदु ?बस्ता पेट तेरु गिंदु रंदु लिजायुं .

मेरु क्या बेटा ,मै त यन्नी रयुं सदानी पर त्वेक सुख होंदु ? बुबा –दादा कु नौ व्हेजांदु इच्छी, हौर क्या थौ ? सयांणाजी कौंका नौन्याल देख.फौरेस्टर भैजी की कुटमदारी देख अर मास्टरजी कौं सणि देख ,सैडु गौं रंदु तारीफ़ करनु . अरे भिंडी नी त इच्छी त कर कुछ ? जा बतेरी रात व्हेगी, रोट्टी खैक सेजा .
वीं सैडी रात निंद नि आई .क्या होलु ,कनु होलु ,मेरु छोरा क्या करलु ? न हो माचु दारुबाज व्हेजाउ ? कुछ धांण –धंदा करलू भी कि नी करन्या ? दसां लग पास ह्व़ेजांदू त मिलेटरी म लग होंदु थौ भरती. गौं का बतेरा नौना तख. अर इच्छी जु बारां कर लेंदु त मास्टर ही बंण जांदु ?

हजार चिंता का बीच निंद कबरी आई, वींन चिताई नी . आँखा खुल्या त घाम गुठ्यारा ऐगी थौ .सौंणी, धारा पर पाणिक गै त वीं सणि भादी दिदी मिली . वींन अपणा मन की बिथा वीं म लगाई. अरे भुली न झुरो जिकुडू, भगवती दैणी होलि अर सब ठीक व्हेजांण, छोरा यन्नी होंदान. देखले वैन अबारी पास व्हेजांण .
( तन्नी फिर लग्युं छ चौमासु, सौंण कु मैनु अर सग्वाड़ों फिर लगीं होलि मुंगरी ,गोदड़ी ,काखड़ी पिंडालु ?) राकेश मोहन थपलियाल,मुंबई

Rm.thapliyal17@gmail.com

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