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टिहरी के इतिहास का निर्णायक दौर: मानवेन्द्र शाह, ।

Pahado Ki Goonj


टिहरी के इतिहास का निर्णायक दौर: मानवेन्द्र शाह,

  – मदन पैन्यूली —

टिहरी गढ़वाल के इतिहास में राजशाही से लोकतांत्रिक व्यवस्था तक का सफर कई महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के संघर्ष और योगदान से जुड़ा है। अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह के दौर में टिहरी रियासत भारतीय संघ में शामिल हुई, वहीं लोकतांत्रिक आंदोलन में परिपूर्णानन्द पैन्यूली की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही।
परिपूर्णानन्द पैन्यूली—लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर
टिहरी रियासत में प्रजामंडल आंदोलन के दौरान परिपूर्णानन्द पैन्यूली लोकतांत्रिक चेतना के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे। उन्होंने टिहरी में राजशाही के स्थान पर जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के लिए संघर्ष किया।
टिहरी रियासत के भारत में विलय के ऐतिहासिक अवसर पर परिपूर्णानन्द पैन्यूली विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम व्यक्ति थे। यह तथ्य उन्हें टिहरी के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय
टिहरी रियासत का भारतीय संघ में विलय 1 अगस्त 1949 को हुआ। इसके साथ टिहरी की स्वतंत्र रियासती व्यवस्था समाप्त होकर वह भारतीय गणराज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बन गई। इस ऐतिहासिक परिवर्तन में राजपरिवार के साथ-साथ प्रजामंडल आंदोलन से जुड़े नेताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
मानवेन्द्र शाह—राजा से लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि तक
राजा मानवेन्द्र शाह का राज्याभिषेक 5 अक्टूबर 1946 को हुआ था। उनके शासनकाल में टिहरी रियासत राजनीतिक उथल-पुथल और लोकतांत्रिक बदलाव के दौर से गुजरी। वर्ष 1947 में किसानों के आंदोलन और वर्ष 1948 में कीर्तिनगर के संघर्ष ने रियासत की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
वर्ष 1948 में संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। पुरुषोत्तम दत्त रतूड़ी की अध्यक्षता में संविधान सभा की 49 बैठकें हुईं। इसी दौर में टिहरी राज्य में अंतिम मंत्रिपरिषद का गठन हुआ और ज्योति प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाया गया।
राजशाही के बाद लोकतांत्रिक राजनीति में भी रहा प्रभाव
टिहरी रियासत के भारत में विलय के बाद राजपरिवार भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बना। राजमाता कमलेन्दुमति शाह वर्ष 1952 में टिहरी से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुईं। वहीं मानवेन्द्र शाह ने भी सक्रिय राजनीति में लंबी पारी खेली और 1957 से 2004 तक आठ बार टिहरी गढ़वाल से सांसद चुने गए।
इस तरह टिहरी का इतिहास केवल राजशाही के अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह तक सीमित नहीं है, बल्कि परिपूर्णानन्द पैन्यूली जैसे लोकतांत्रिक आंदोलन के नेताओं के संघर्ष से भी गहराई से जुड़ा है। एक ओर राजशाही के अंतिम चरण का प्रतिनिधित्व मानवेन्द्र शाह करते हैं, तो दूसरी ओर जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं में परिपूर्णानन्द पैन्यूली का नाम महत्वपूर्ण रूप से सामने आता है।
5 जनवरी 2007 को मानवेन्द्र शाह के निधन के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन टिहरी को राजशाही से लोकतंत्र तक पहुंचाने वाले इस ऐतिहासिक दौर की स्मृतियां आज भी उत्तराखंड के इतिहास में जीवंत हैं।

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