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डूबी हुई स्मृतियों का उत्सव : पुरानी टिहरी का खिचड़ी संग्रदा यह फोटो केवल एक दृश्य नहीं है— यह स्मृति का मैदान है।

Pahado Ki Goonj

डूबी हुई स्मृतियों का उत्सव : पुरानी टिहरी का खिचड़ी संग्रदा
यह फोटो केवल एक दृश्य नहीं है—
यह स्मृति का मैदान है।

मदन पैन्यूली ।

यही वह आदर्श मैदान था, जहाँ कभी खिचड़ी संग्रदा (माघी) मेला लगता था। आज यह मैदान जलमग्न है, पर इसकी यादें नहीं डूबीं। पानी के नीचे दबे पत्थरों, गलियों और घाटों के साथ-साथ वहाँ की हँसी, आस्था, व्यापार और लोकगीत आज भी बहते हैं—भागीरथी और भिलंगना की धाराओं की तरह।
गढ़वाल की लोकसंस्कृति में मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं, बल्कि समुदाय का सामूहिक उत्सव थी। पुरानी टिहरी का माघी/संगम मेला इसी परंपरा का हृदय था। दूर-दूर के गाँवों से लोग देव-डोलियों के साथ आते, भागीरथी-भिलंगना के संगम पर स्नान करते, पूजा-अर्चना करते और फिर मेले की रंगत में घुल जाते। यह परंपरा उत्तरकाशी के थौलू (बाड़ाहाट) मेले से मेल खाती थी—क्योंकि दोनों की आत्मा भागीरथी से बँधी थी।
पुरानी टिहरी टिहरी रियासत की राजधानी थी। इसलिए यहाँ का मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक व्यापारिक धड़कन भी था। ऊन, अनाज, नमक, जड़ी-बूटियाँ, हस्तशिल्प—सबका आदान-प्रदान होता। तिब्बत, नेपाल और स्थानीय व्यापारी यहाँ जुटते।
राजशाही काल (1815–1949) में मेले राजकीय संरक्षण में फले-फूले। प्रदर्शनी मैदान, घंटाघर, राजमहल, रानी दरबार और बाज़ार क्षेत्र—हर ओर लोकनृत्य, भक्ति-गीत और दुकानों की कतारें पुरानी टिहरी को एक जीवंत रंगमंच बना देती थीं।
खिचड़ी संग्रदा केवल एक पकवान नहीं था—वह साझी रसोई थी।
बड़े पतीले, लकड़ी की आँच, घी की सुगंध और थाली में उतरती सादगी—इसमें बराबरी और अपनापन था। अमीर-गरीब, पहाड़-मैदान—सब एक पंक्ति में। यही लोकसंस्कृति का असली सौंदर्य है।
टिहरी अंचल में चंद्रबदनी मेला, रण-भूत कौथिग और बूढ़ाकेदार का गुरु कैलापीर मेला प्रसिद्ध रहे हैं, लेकिन संगम तट पर लगने वाला माघी/स्नान मेला पुरानी टिहरी की पहचान था। आज भी बुजुर्गों की आँखों में उसकी रौनक चमक उठती है—मानो जल के नीचे भी दीप जल रहे हों।
टिहरी बाँध बना और पुरानी टिहरी झील में समा गई। मेला-मैदान भी।
पर परंपराएँ पूरी तरह नहीं डूबीं। नई टिहरी, बौराड़ी बाज़ार और आसपास के इलाकों में स्मृतियों के बीज आज भी अंकुरित होते हैं। गर्मियों में जब जलस्तर घटता है और पुराने अवशेष झलकते हैं—तो मन ठहर जाता है।
पुरानी टिहरी के मेले उत्तराखंड की लोक-आत्मा थे—जैसे बागेश्वर की उत्तरायणी या उत्तरकाशी का थौलू।
शहर डूब गया, संस्कृति नहीं।

सआभार ।

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