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विकास के नाम पर उजड़ता उत्तराखंड, आखिर कब रुकेगा पेड़ों का कत्ल?- शांति ठाकुर

Pahado Ki Goonj

विकास के नाम पर उजड़ता उत्तराखंड, आखिर कब रुकेगा पेड़ों का कत्ल?- शांति ठाकुर
उत्तरकाशी । बड़कोट।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हर साल पर्यावरण दिवस, हरेला और अन्य अभियानों के तहत लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन दूसरी ओर सड़क चौड़ीकरण और नई परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण ग्लेशियर लेडी शांति ठाकुर का कहना है कि यदि एक ओर पौधारोपण का प्रचार किया जाए और दूसरी ओर हजारों परिपक्व पेड़ों को काट दिया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण नहीं बल्कि केवल दिखावा बनकर रह जाता है।
आलोचकों का कहना है कि ऋषिकेश–देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग के फोरलेन निर्माण के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान किया जा रहा है। वहीं देहरादून–झाझरा–मसूरी प्रस्तावित सड़क परियोजना में भी लगभग 18 हजार पेड़ों के कटान का अनुमान जताया जा रहा है। उनका तर्क है कि यदि इसी तरह विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगलों की कटाई जारी रही तो उत्तराखंड की प्राकृतिक पहचान और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है। एक पत्रकारों से बात कर  पर्यावरण प्रेमी शांति ठाकुर का कहना है कि जो लोग पेड़ों को बचाने की आवाज़ उठा रहे हैं, उन्हें अक्सर “विकास विरोधी” कहकर निशाना बनाया जाता है, जबकि उनका उद्देश्य विकास रोकना नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ संतुलित विकास सुनिश्चित करना है।
उनका सुझाव है कि जहां संभव हो, वहां सड़कों का सीमित चौड़ीकरण किया जाए ताकि यातायात भी बेहतर हो और पेड़ों का अनावश्यक कटान भी न करना पड़े। उनका मानना है कि विकास की योजनाएं ऐसी हों जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ें, न कि पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाएं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि आज जंगलों और पेड़ों की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उनका कहना है कि उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल, नदियां और पहाड़ हैं, इसलिए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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