
धराली-हर्षिल में उभर रहा नया खतरा? भागीरथी के बहाव में रुकावट से झील बनने की आशंका, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
उत्तरकाशी। रिपोर्ट । मदन पैन्यूली
पिछले वर्ष धराली में आई विनाशकारी आपदा की यादें अभी धुंधली भी नहीं हुई हैं कि इस बार मानसून के शुरुआती दौर में हर्षिल-धराली क्षेत्र में एक नई चिंता सामने आ गई है। भागीरथी नदी के बढ़ते जलस्तर, लगातार हो रहे कटाव और नदी में गिरे पेड़ों के कारण बहाव प्रभावित होने से स्थानीय लोगों में संभावित झील बनने की आशंका गहरा गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में यह स्थिति बड़े खतरे का रूप ले सकती है।
स्थानीय लोगों में बढ़ी चिंता
हर्षिल क्षेत्र में बीते कुछ दिनों से लगातार वर्षा के बाद भागीरथी नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा है। नदी के किनारों पर कटाव बढ़ने के साथ कई स्थानों पर पेड़ और मलबा नदी में गिरने से पानी का प्रवाह धीमा पड़ने की बात सामने आई है। इससे स्थानीय ग्रामीणों में आशंका है कि यदि बहाव पूरी तरह बाधित हुआ तो अस्थायी झील जैसी स्थिति बन सकती है, जो अचानक टूटने पर नीचे बसे क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
वैज्ञानिकों ने जताई भविष्य की चिंता
भू-वैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, नदी अवरोध और अस्थायी झीलों का निर्माण सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह लंबे समय तक बाधित रहता है तो पानी का दबाव बढ़ने से अचानक झील टूटने का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसी घटनाएं फ्लैश फ्लड का कारण बनती हैं, जिससे भारी तबाही हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हर्षिल-धराली क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। लगातार हो रहे कटाव और अनियोजित ढलान परिवर्तन भविष्य में जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसलिए क्षेत्र की नियमित वैज्ञानिक निगरानी और समय पर सुरक्षात्मक कार्य आवश्यक हैं।
पिछले साल की आपदा अब भी याद
5 अगस्त 2025 को धराली क्षेत्र में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई थी। बाढ़ और मलबे के तेज बहाव से सड़कें, पुल, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाएं प्रभावित हुई थीं। उस आपदा ने यह स्पष्ट कर दिया था कि हिमालयी क्षेत्रों में छोटी सी प्राकृतिक रुकावट भी बड़े संकट का कारण बन सकती है।
इसी कारण इस बार हर्षिल में सामने आई स्थिति को लेकर स्थानीय लोग पहले से अधिक सतर्क और चिंतित हैं।
प्रशासन का क्या कहना है?
आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि फिलहाल हर्षिल में स्थायी झील बनने जैसी स्थिति नहीं है। हालांकि नदी के प्रभावित हिस्सों में सुरक्षात्मक कार्य किए जा रहे हैं और हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। प्रशासन का दावा है कि किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
मानसून अभी बाकी, चुनौती भी बड़ी
उत्तराखंड में मानसून की शुरुआत हो चुकी है और अभी लगभग ढाई महीने का वर्षाकाल शेष है। मौसम विभाग द्वारा आगामी दिनों में भी कई स्थानों पर भारी बारिश की संभावना जताई गई है। ऐसे में यदि भागीरथी का जलस्तर लगातार बढ़ता है और नदी में मलबा जमा होता रहा तो जोखिम और बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति से निपटने के लिए निम्न कदम आवश्यक हैं—
- भागीरथी नदी के बहाव की नियमित वैज्ञानिक मॉनिटरिंग।
- नदी में गिरे पेड़ों और मलबे को तत्काल हटाने की व्यवस्था।
- कटाव प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित सुरक्षात्मक कार्य।
- स्थानीय लोगों के लिए समय पर चेतावनी प्रणाली को सक्रिय रखना।
- संवेदनशील क्षेत्रों का ड्रोन और सैटेलाइट सर्वे कराना।
फिलहाल सतर्कता ही सबसे बड़ा उपाय
हालांकि प्रशासन ने तत्काल किसी बड़े खतरे से इनकार किया है, लेकिन वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों की आपदाओं ने यह साबित किया है कि हिमालयी क्षेत्रों में छोटी प्राकृतिक घटनाएं भी कुछ ही घंटों में बड़े संकट का रूप ले सकती हैं। ऐसे में हर्षिल-धराली क्षेत्र में लगातार निगरानी, समय पर सुरक्षात्मक कार्य और वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप कार्रवाई ही भविष्य में संभावित आपदा के जोखिम को कम कर सकती है।

