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लोगों के घर रौशन करने के लिए लोहारी गांव ने ली जल समाधि

Pahado Ki Goonj

देहरादून। लखवाड़-व्यासी बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले लोहारी गांव ने हमेशा के लिए जल समाधि ले ली है। करीब 71 परिवारों वाला लोहारी गांव सिर्फ अब इतिहास के पन्नों में ही पढ़ा और देखा जाएगा। व्यासी बांध का पानी धीरे-धीरे गांव में बढ़ रहा है। ऐसे में लोहारी गांव के ग्रामीण अपनी आंखों के सामने अपने घरों को जलमग्न होता देख रहे हैं और यह देखकर ग्रामीणों के आंसू नहीं रुक रहे हैं।
उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ों में रहने वाले लोगों का जीवन किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम नहीं है। उत्तराखंड में कभी कुमाऊं तो कभी गढ़वाल में बनने वाले विद्युत उत्पादन बांधों की वजह से सैकड़ों परिवारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। टिहरी से लेकर अन्य बांध परियोजनाओं में हजारों लोगों ने विस्थापन का दंश झेला है। एक बार फिर से उत्तराखंड के देहरादून स्थित विकासनगर क्षेत्र के गांव के लोग अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए हैं। जिस गांव में वह पैदा हुए, बचपन बीता, शादी हुई और हर रीति-रिवाज का वह हिस्सा बने, आज वह गांव पानी में जलमग्न हो गया है। लोहारी गांव के लोगों का कहना है कि उनको इस बात का बहुत दुःख हो रहा है कि जिस गांव में उनका बचपन बीता, आज वो गांव हमेशा के लिए जलमग्न हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि आज वो अपनी जमीन और अपनों घर को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हैं। हमारे बच्चे रो रहे हैं. अपनी पैतृक संपत्ति को इस तरह अपनी आंखों के सामने जलमग्न होते हुए देख रहे हैं। व्यासी बांध परियोजना का जलस्तर 669 मीटर तक पहुंचने के साथ ही कल सुबह यानी सोमवार को पानी खेतों स्कूल पंचायत घर और गांव के घरों तक पहुंचने लगा था। धीरे-धीरे शाम तक जलस्तर बढ़ता गया और घरों की दहलीज को लांघते हुए पानी ऊपर तक चढ़ने लगा है। यह बांध परियोजना 120 मेगावाट की परियोजना है, जिसका स्वामित्व उत्तराखंड के पास ही है। इस बांध की ऊंचाई 204 मीटर यानी 669 फीट है, जबकि इसकी उत्पादन क्षमता को 300 मेगावाट तक बढ़ाया जा सकता है। इस परियोजना का काम साल 1987 में शुरू हुआ था, जिसको अब पूरा किया जा रहा है।

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