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प्राचीन केदार मंदिर: उत्तरकाशी की धार्मिक सेवा और सांस्कृतिक धरोहर ।
उत्तरकाशी, जिसे देवभूमि और मंदिरों की नगरी कहा जाता है, अनेक प्राचीन पौराणिक शिवालयों का केन्द्र है। इन्हीं में से एक है प्राचीन केदार मंदिर, जो उत्तरकाशी के केदार घाट के निकट स्थित है। यह मंदिर केदारनाथ के प्रतिरूप के रूप में माना जाता है, और पुरातन समय में जब लोग केदारनाथ नहीं जा पाते थे, तो इसी मंदिर में जल अर्पित कर पुण्य प्राप्त किया करते थे।
इस मंदिर में स्थित खिचड़ी नुमा शिवलिंग, भगवान राम दरबार, तथा पाषाणकालीन हनुमान जी की भव्य प्रतिमा इसकी प्राचीनता और दिव्यता को दर्शाती हैं। इस मंदिर की स्थापना स्वामी कमल नाथ दास जी महाराज ने सैकड़ों वर्ष पूर्व की थी। बाद में उनके शिष्य गोलोकवासी स्वामी भगवान दास जी महाराज ने यहां कठोर तपस्या की और इस क्षेत्र को धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का कार्य किया।
स्वामी भगवान दास जी के मार्गदर्शन में अष्टादश महापुराण कथा का आयोजन उत्तरकाशी व आसपास के गांवों में अनेक बार निशुल्क किया गया। मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है, बल्कि एक सेवा धाम भी है — जहां गरीब ब्राह्मण छात्रों को शिक्षा, भोजन और आवास उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही साधु-संतों के लिए भी नित्य भोजन व ठहरने की व्यवस्था की जाती है।
मंदिर की एक अद्भुत विशेषता यह है कि जब इसकी खुदाई की गई तो लगभग 10 मीटर गहराई तक खुदाई के बावजूद इसकी पूरी गहराई का पता नहीं चल सका, जिससे इसकी रहस्यमयता और भी बढ़ जाती है।
वर्तमान में इस मंदिर की देखरेख स्वामी राघवेन्द्र दास महाराज कर रहे हैं। उत्तरकाशी मंदिर जीर्णोद्धार समिति के अध्यक्ष अजय बडोला के अनुसार, यह उत्तरकाशी का ऐसा एकमात्र मंदिर है जहां भूखे को भोजन और आश्रय मिलता है। यहाँ पूजा के साथ सेवा को भी सर्वोपरि माना जाता है।
शिव नगरी उत्तरकाशी में गोपेश्वर महादेव, रूद्रेश्वर महादेव, काशी विश्वनाथ, ओणेश्वर महादेव, कोटेश्वर महादेव, कालेश्वर महादेव, नरमदेश्वर महादेव, कैलाश महादेव सहित अनेक प्राचीन शिव मंदिर स्थित हैं। सावन माह में इन शिवालयों में जलाभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है। साथ ही काशी में दान-पुण्य को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन माह में मांसाहार करना भी पाप की श्रेणी में आता है
विशेष लेख: अजय प्रकाश बडोला, अध्यक्ष उतर काशी मन्दिर जीणोद्धार समिति


