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हिंदी पत्रकारिता दिवस पर हिंदी को राष्ट्रीय स्तर व्यवहारिक रूप में लाने के लिए सभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे पिलर जो अपने को कलम कार होने के लिए भी दिखाई नही देता, नीचे से कलम घिसे जावो फोटो खीचो चलते जावो उनको अपने लिए संवै धानिक अधिकार दिलाने के लिए सद बुद्धि देने के लिए माँ सरस्वती से 🙏🏻 करते हैं जानिए सत्य को

Pahado Ki Goonj

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर हिंदी को राष्ट्रीय स्तर व्यवहारिक रूप में लाने के लिए सभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे पिलर जो अपने को कलम कार होने के लिए भी दिखाई नही देता, नीचे से कलम घिसे जावो फोटो खीचो चलते जावो उनको अपने लिए संवै धानिक अधिकार दिलाने के लिए बुद्धि देने के लिए माँ सरस्वती से 🙏🏻: https://youtu.be/3Blv9jiS3OE?si=3xl0iVscdIpxzZzy

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99.99% फिसदी नहीं जानते संविधान में भारत-सरकार किसे कहां हैं?
( भारत की गुलाम मानसिकता का जीवित प्रमाण)

15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों से आजाद हो गया परन्तु मानसिक रूप से वो आज भी गुलाम हैं | आजादी मीले व संविधान लागू हुये 75 वर्षों से ज्यादा हो गये परन्तु मुश्किल से दो-चार माननीय ही होंगे जिन्हें पता हो कि संविधान में भारत-सरकार किसे कहां गया हैं |

भारत-सरकार या गवर्मेंट ऑफ इंडिया की परिभाषा स्पष्ट रूप से किसी एक अनुच्छेद में नहीं दी गई हैं बल्कि ये विभिन्न प्रावधानों के सन्दर्भ में समझी जाती हैं | वर्तमान में इन्ही प्रावधानों के अलग-अलग अर्थ सभी अपने स्वार्थ, लालच, जरूरत व मानसिक सोच की क्षमता के अनुरूप निकालते हैं और भारत-सरकार पर अपना अधिकार व वर्चस्व बनाते हैं | इसी कारण भारत का लोकतन्त्र हर एक नये नियम व कानून के साथ-साथ बिखरता व दूसरे देशों के विकास से पीछडता जा रहा हैं | दुनिया के हर मानवीय सूचकांक में भारत रैंकिंग में नीचे से प्रथम आने की रेस में होने का यह भी बहुत बड़ा कारण हैं |

संविधान के अनुच्छेद 12 में राज्य यानि स्टेट की परिभाषा दी गई हैं जो मौलिक अधिकारों के सन्दर्भ में सरकार की व्याख्या करती हैं | इसके अनुसार राज्य में भारत-सरकार, संसद, प्रत्येक राज्य की सरकार विधानमंडल और भारत के श्रेत्र के भीतर या भारत-सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण शामिल हैं |

इसमें राज्य शब्द का इस्तेमाल दो बार किया हैं और दोनों जगह अलग-अलग अर्थ निकलने से यह परिभाषा अन्तर्द्वन्द में फंसी हुई नजर आती हैं | भारत का संविधान कई देशों के संविधान से मिलकर बना हैं उसमें भी ब्रिटिश सरकार के तौर-तरीके प्रभावी हैं | भारत आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार के अधीन था इसलिए उसे राज्य के रूप में दर्शाया गया है। आजादी के बाद यह राज्य शब्द बदलकर देश या राष्ट्र हो जाना चाहिए था परन्तु अलग-अलग भाषाओं को रूपान्तरण करने से यह चूक हो गई लगती हैं |

आज के सन्दर्भ में अमेरिका ने ग्रीनलैंड और कनाडा को अपने देश में शामिल करने के लिए उन्हें राज्य बनने का ऑफर दिया | इसका सीधा अर्थ कोई देश किसी दूसरे देश में मीलता हैं तो व उसका राज्य बनता हैं और किसी देश से उसका राज्य अलग होता हैं तो वह नया देश बनता हैं | भारत ब्रिटिश शासन से अलग हुआ इसलिए विज्ञान के तर्को के आधार पर तुरन्त प्रभाव से अनुच्छेद 12 में प्रथम राज्य शब्द को बदलकर देश या राष्ट्र कर देना चाहिए |

भारत-सरकार का व्यापक अर्थ संविधान के ढांचे से निकलता है परन्तु संविधान तो किताब रूप में लिखा गया न कि किसी ढांचे के रूप में बनाया गया | 2011 में ही युवा वैज्ञानिक शैलेन्द्र कुमार बिराणी ने अपने आविष्कार की फाईल जो दुनिया भर के दस्तावेजों से भरी थी उसे राष्ट्रपति को भेजा तो उनके सम्मान में एक ग्राफिक्स फोटो कवर पेज पर लगाई वो ही दुनिया भर में किसी देश के संविधान का बना पहला व अब तक का मौजूद संविधान का ढांचा हैं | इस पर राष्ट्रपति-सचिवालय की मोहर व आधिकारिक हस्ताक्षर हैं इसलिए इसे ही आधार मानकर भारत-सरकार को आसानी से समझा जा सकता हैं |

अनुच्छेद 12 के अनुसार लोकतन्त्र का पूरा ढांचा जिसमें उसके चारों स्तम्भ,स्वायत संस्थाओं से बना चारों तरफ घेरा व अन्य सभी ढांचागत संरचनाएं आपस में मिलकर सामुहिक रूप से भारत-सरकार कहलाती है। इसमें एक भी हिस्सा रह जाये तो भारत-सरकार नहीं बनती व कोई भी एक हिस्सा अपने आप को भारत-सरकार नहीं कह सकता चाहे प्रधानमंत्री की प्रमुखता वाली कार्यपालिका ही क्यों ना हो | कानून, नियम, प्रावधान व प्रोटोकॉल पर राष्ट्रपति एक बार साईन कर दे तब ही वह भारत-सरकार का आदेश कहलाता हैं | संविधान का अनुच्छेद 77 भी इसी बात की पुष्टि करता हैं जो भारत-सरकार के सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम से करे जाने की कहता हैं |

संविधान के भाग पांच में अनुच्छेद 52 से लेकर 151 तक परिभाषित भारत-सरकार की कार्यकारी शक्ति के रूप में करा हैं | इसमे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद शामिल हैं | इसका सीधा अर्थ प्रधानमंत्री की प्रमुखता वाली कार्यपालिका कार्य के आधार पर अपने आप को सर्वोच्च कह सकती हैं परन्तु भारत-सरकार नहीं कह सकती | इसी प्रकार न्याय के लिए न्यायपालिका, कानून बनाने के लिए विधायिका यानि संसद सर्वोच्च हैं परन्तु भारत-सरकार नहीं हैं | इन सभी के भवनों पर नाम के पीछे भारत-सरकार सामुहिक ढांचे के रूप में लिखा है न कि अलग-अलग रूप से |

संविधान के अनुसार भारत-सरकार देश के नागरिकों की बनती हैं, राष्ट्रपति की भी नहीं वो तो सिर्फ़ प्रमुख हैं जिन्हें सीधे फैसले लेने का अधिकार नहीं हैं | यहि लोकतन्त्र की परिभाषा हैं जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन

फला व्यक्ति की सरकार, ढीमका व्यक्ति की सरकार, इस पार्टी की सरकार, उस पार्टी की सरकार, इन राजनैतिक दलों के गठबंधन की सरकार, फला व्यक्ति की गारन्टी, व्यक्ति विशेष का वचन, फिल्मों की भाषा मेरा वचन ही हैं शासन इत्यादि-इत्यादि गैर कानूनी, असंवैधानिक, असैद्धान्तिक, अमर्यादित व अनैतिक हैं | इन शब्दों का बार-बार प्रयोग प्रचार, प्रसार यह सब संविधान के अनुसार राष्ट्रद्रोह कहलाता हैं क्योंकि ये देशवासियों की भारत-सरकार को लोगों के ब्रैनवाश करके नाजायज रूप से अपहरण, कब्जा व बन्दी या गुलाम बनाने के हथकंडों व कोशिश करने के दायरे में आते हैं |

संविधान का अनुच्छेद 13 भी अनुच्छेद 12 से ही जुडा हैं जो ग्राफिक्स में बताये मूलभूत ढांचे को बदलने की शक्तियां किसी को नहीं देता हैं परन्तु उनके नाम समय के बढते चक्र के साथ बदले जा सकते हैं और नई संरचनाओं को जोडा भी जा सकता हैं बेशर्त मूलभूत ढांचा वैसा का वैसा ही रहें | इसे ही आप संविधान-संसोधन के रूप में जानते है |

शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक
[01/04, 10:47 am] Virsnsari: 🔭 साइंटिफिक-एनालिसिस 🔬

पत्रकारों को प्राप्त हो चुके अमृत को पीने से ज्यादा अप्रैल फूल बनना व लोगों को बनाने के साथ अपने साथियों को भी बनाने में ज्यादा रूचि हैं |

खबरों के महामंथन से हरिद्वार महाकुम्भ में अमृत तो निकल गया परन्तु अधिकांश पत्रकार पीने को तैयार नहीं हैं | ये तो तिरंगा फहराने, शहीदों को श्रद्धांजलि देने व अपने आप को भारतीय मीडिया कहने से भी डर रहे है | कौनसा अमृत निकला व कहां रखा पडा हैं उसे जानने के लिए यह खबर पढे ⤵️

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जनादेश के प्रतिबिम्ब संसद व विधानसभाओं को सर्वोपरी रखने पर सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ राजनैतिक बवंडर!

अपने आप को बड़ा व भारत-सरकार को अपने अधीन रखने के सत्ता नियंत्रण खेल में अपनी-अपनी मानसिक क्षमता के अनुरूप एक ही संविधान के अलग-अलग अर्थ बताने की मारामारी के बिच इस बार पानी उल्टी दिशा में बहता हुआ दिख रहा है | राजनैतिक दांव-पेंच के कर्ताधर्ता अधिकांश राजनैतिक दल चुप्पी साध रहे हैं और राज्यपाल व उपराष्ट्रपति जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर राजनीति न करने की शपथ लेकर बैठे माननीय जनादेश के प्रतिबिम्ब संसद व विधानसभाओं को सर्वोपरी रखने पर उच्चतम न्यायालय के खिलाफ राजनैतिक बवंडर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं और संवैधानिक संस्थाओं में टकराव करवा के संविधान के अनुसार देश की जनता की भारत-सरकार में विघटन पैदा कर रहे हैं |

इसकी शुरूआत आठ अप्रैल को तमिलनाडु की तथाकथित सरकार व राज्यपाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक व्यवस्था व प्रोटोकॉल निर्धारण से हुई | यह व्यवस्था थी कि राज्यपाल को विधानसभा की ओर से भेजे गये बिल पर एक महीने के भीतर फैसला लेना होगा व राज्यपाल की तरफ से भेजे गये बिल पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा अन्यथा उन्हें इस देरी का कारण बताना होगा |

इसी तरह का मामला केरल के राज्यपाल व वहां की तथाकथित सरकार के मध्य में भी चल रहा था इसलिए केरल के राज्यपाल ने अपने आप को वैचारिक रूप से गलत साबित होने के डर से असंवैधानिक कदम उठाते हुए राजनैतिक दांव चल दिया | इस दांव में राज्यसभा के सभापति जिन्हें उपराष्ट्रपति भी कहां जाता हैं जो आये दिन न्यायपालिका को संविधान का पाठ पढाने की जुबानी कोशिश करते रहते वो कूद पडे और राजनैतिक बवंडर पैदा करने की पूरी कोशिश कर डाली |

केरल के राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट के एक नियम या प्रोटोकॉल को संविधान के अनुच्छेद 201 के अनुरूप राष्ट्रिय ध्वज में विद्यमान चक्र की समय के साथ आगे की दिशा में गतिशीलता को बनाये रखते हुए जो समय-सीमा तय करी उसे संविधान संशोधन का जामा पहनाकर सुप्रीम कोर्ट व सदन यानि संसद के मध्य राजनीति के दांव भेद नीति को लगाकर आपस में लडवा दिया | समय-चक्र को कानून न बनने देने के माध्यम से किसी राज्यपाल व राष्ट्रपति द्वारा रोक देने से संविधान के आगे कई अनुच्छेद निरर्थक हो जाते जो एक बार कानून बन जाने पर भी उसमे संसोधन, बदलाव करने व हटाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं | संविधान राज्यपाल और राष्ट्रपति को राजशाही वाले राजा की पदवी नहीं देता वो तो लोकतन्त्र में सिर्फ जनता के सेवक के रूप में जवाबदेही देता हैं व उसे पुरा करने के लिए ताकत |

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले के माध्यम से यह सुनिश्चित करा कि संसद यदि संविधान संशोधन कर दे तो राष्ट्रपति भी विचाराधीन का बोलकर हस्ताक्षर न करके उस संविधान संसोधन को लागू होने से नहीं रोक सकते | इस फैसले ने तो विचाराधीन वाले लूप-पोल व मनमानी के खेल को तीन महीने के समय दायरे में संविधान के अन्दर बांध दिया हैं व संसद और विधानसभाओं को सर्वोपरी बनाये रखा है। यह समय-सीमा उसी काल खण्ड का हिस्सा हैं जिसके माध्यम से जनप्रतिनिधीयों, कार्यपालिका व सरकार का कार्यकाल पांच वर्षों के लिए निर्धारित होता हैं | किसी भी चुनी हुई सरकार को उसके तय समय में पूरे अधिकार मीलने चाहिए तभी तो लोकतन्त्र कहलायेगा अन्यथा वो राजशाही ही रहेगा |

उच्चतम मानव ने तो नये नियम, प्रोटोकॉल, व्यवस्था से तो सिर्फ समय-सीमा तीन माह पूरी हो जाने पर विलम्ब का उचित कारण बताने को कहां हैं | यदि वो कोई सजा तय करती, शक्तियों पर पाबन्दी लगाती या अधिकारों को कम करती या निश्चित समय बाद विचाराधीन कानून स्वत: लागू हो जाने का बोलती तो वह संविधान संसोधन के दायरे में आता | निर्धारित समय-सीमा के बाद उचित कारण बताने को कहकर उसने न केवल लोकतन्त्र को मजबूत करा हैं बल्कि राज्यपालों व राष्ट्रपति को सुरक्षा भी प्रदान करी हैं | भारत-सरकार की मालिक आम जनता के दिल व दिमाग में गलत दुर्भावना न घर कर जाये की उनके मुंह के निवाले पर भी टैक्स के पैसे से मोटी तनख्वाह व उच्चकोटी की सुख-सुविधाएं लेकर राज्यपाल और राष्ट्रपति कामचोरी करते हुए सिर्फ़ सुख-सुविधाओं का भोग करके मौज उडाते हुए टाईम पास कर रहे हैं |

समय-सीमा तय होने से राज्यपाल व राष्ट्रपति पर कोई गैरकानूनी काम करने वाला, राष्ट्रद्रोही, तानाशाह, दूसरा देश, आतंकवादी, विरोधी ताकतों के एजेन्ट, स्वार्थी, लालची उनके ऊपर किसी भूल, पारिवारिक दबाव, सैक्सुअल हैरेसमेंट, सामाजिक दबाव, डिजिटल अरेस्ट, निजी डाटा चुराकर या लिंक करवा के उनका शोषण करते हुए गलत आदेश व मनमाफिक असंवैधानिक काम नहीं करवा सकते | यह असंवैधानिक काम किसी अतिशीघ्र आवश्यक कानून को लागू होने से रोकना भी हो सकता हैं |

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