हाईकोर्ट के शराब बंदी पर सुप्रीम कोर्ट गया आबकारी विभाग

Pahado Ki Goonj
देहरादून–उत्तराखंड में तीन जनपदों रुद्रप्रयाग,चमोली,उत्तरकाशी में चारधाम यात्रा के मध्यनजर हाईकोर्ट ने1अप्रैल से शराब पर पूरी तरह से रोक लगाई थी। 1 अप्रैल आने से पहले जिस प्रकार से हाईकोर्ट के शराब बंदी के आदेश के खिलाफ राज्य के शासन की अनुमति के बाद आबकारी विभाग ने राजस्व नुकसान के तर्क के साथ सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को चुनोती दी है। उससे नई बहस खड़ी हो गई है। लोग कहने लगे है हाईकोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है।लेकिन सवाल यह भी उठाये जा रहे है कि राजस्व नुकसान का हवाला देकर आबकारी विभाग द्वारा शराब माफिया की पैरवी तो नहीं की जा रही है।
नैनीताल हाई कोर्ट ने 8दिसम्बर 16 को राज्य के तीन जनपदों मे शराब पूर्णतः बंद करने के आदेश चारधाम यात्रा के मध्यनजर जारी किया था। जिसकी की हर जगह सराहना भी हुई। अब आदेश के खिलाफ उत्तराखंड आबकारी विभाग ने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है।आबकारी विभाग ने विशेष पुनर्विचार याचिका जो की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है। उसमे तीनो जनपदों से प्राप्त होने वाले राजस्व के आंकड़े भी दिए गए है।विभाग ने कोर्ट को बताया है की इन तीनो जनपदों रुद्रप्रयाग 9करोड़ 22लाख 41हजार,चमोली से 15करोड़36लाख16हजार और उत्तरकाशी से18करोड़25लाख41हजार का राजस्व प्राप्त होता है जिसका की राज्य को इस फैसले से नुकसान होगा। विभाग का यह तर्क कुछ हद तक सही भी है।लेकिन शराब माफिया को इस बंदी से बहुत बड़ा नुकसान होना तय है क्योकि इन जनपदों में जिस प्रकार से घटिया शराब अधिक दामो में परोसी जाती है वह किसी से छुपा नहीं है। जिस कारण विभाग की इस तेजी पर सवाल उठाये जा रहे है। जिस प्रकार शराब माफिया आबकारी विभाग के साथ मिलकर खेल खेलता है, उसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि जिन शहरों में रोजगार के साधन होने चाहिये थे वे दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहे है बल्कि वहाँ दारू की दुकाने दर्जनों जरूर सजी है?आम नागरिक के लिए जीवन जीने की मूलभूत सुबिधायें सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा की हालात किसी से छुपी नहीं है । 16 साल में जो सुबिधायें होनी चाहिए थी वो ऊंट के मुह में जीरे जैसी है ।अब हमारे नेता अधिकारीयो का शराब के प्रति इस समर्पण को क्या कहा जायेगा?भले ही आबकारी विभाग को शासन ने हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट जाने की इजाजत दे दी है लेकिन सवाल यह भी है की शासन में बैठे अधिकारी कास राज्य हित के अन्य मामलो में भी इसी प्रकार की तेजी दिखाते तो पढे लिखे नोजवान 7 लाखो बेरोजगार की फौज नोकरी की तलाश में यूँ खड़ी न होती, हजारो पहाड़ी गाउँ बिरान नहीं होते, लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा होता नहीं।एक बात जो मेरे दिल में है की दारू की दुकानों को बचाने से अच्छा पलायन युवाओ को रोजगार ,मूलभूत सुबिधाओं के बिषय में भी ऐसी ही फुर्ती तंत्र दिखता तो राज्य इस मुहाने पर खड़ा नहीं होता।

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