लोकतंत्र को बचाने के लिए नरेंद्र मोदी को क्यो नही आना चाहिए

एक कहावत है कि “बन्द है मुट्ठी तो लाख की। खुल गयी तो फिर खाक की।”

इस कहावत का पुनर्पाठ करते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि जब आप यह जानते हैं कि मुट्ठी में कांच का टुकड़ा छिपा हो औऱ भ्रम हीरे का हो रहा हो तो तो मुट्ठी बन्द रखनी चाहिए।

बदकिस्मती से नरेन्दर दामोदर मोदी जी के बड़बोले पन से उनके तमाम कृतित्व का रेशा-रेशा अब बिखर कर जनता के सामने आ चुका है। बन्द मुट्ठी खुल चुकी है।

आप विश्व की तमाम मजबूत अर्थव्यवस्थाओं पर नजर डालिए। आप हैरान होंगे कि उन अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्राध्यक्ष अर्थशास्त्र की मूल समझ के साथ आगे बढ़े औऱ उन्होंने अपने मुल्क की मुद्रा को अपना हथियार बनाकर रखा। जब भी मुल्क में कोई आर्थिक घटना घटती है, सबसे पहले उसका प्रभाव देशों की मुद्रा पर पड़ता है। जापान के शिंजे आबो जब जापान के प्रधान मंत्री हुए उन्होंने जापान की करेंसी सस्ती करने की पहल की। चीन को जापान ने अपनी करेंसी की महत्वपूर्ण प्लानिंग से काउंटर किया। चीन भी अपनी करेंसी की वजह से अमेरिका तक को आँख दिखाने की गुस्ताखी करता रहता है। विश्व व्यापार रोक देने की कितनी ही धमकियों के बावजूद चीन ने अपनी करेंसी को ओपन मार्किट मे नही आने दिया। दरअसल चीन की करेंसी मौजूदा कीमत से बहुत स्ट्रांग है लेकिन उसने उसे सस्ती करके रखा हुआ है। मोदी जी के भक्त 2014 में कहते थे कि मोदी जी आएंगे तो रुपये औऱ डॉलर का भाव बराबर कर देंगे। मोदी जी सुषमा जी औऱ सब भाजपाई कहते रहे कि तेजी से रूपया गिर रहा है या नेता अब तो समझना मुश्किल है(ऐसा वे कांग्रेस के नेताओ के सन्दर्भ में कहते रहे)। मोदी जी प्रधानमंत्री बने तो रुपये डॉलर की एक्सचेंज वैल्यू इतिहास में सबसे highest गई। अमेरिका भी सिर्फ औऱ सिर्फ अपने डॉलर की धौंस की वजह से खड़ा है। युरोप में जो मंदी है उसके पीछे बड़ी वजह एशिया की सस्ती करेंसी औऱ खुद की महँगी करेंसी है। वहाँ के तमाम कारखाने सस्ती करेंसी वाले मुल्कों मे शिफ्ट हो गए हैं। यूरोप और अमरीका में अब सिर्फ करेंसी वार है कि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की करेंसी के रूप में कौन आगे रह सकता है। अमेरिका इसमे यूरोप से कहीं आगे है।

मोदी जी को कभी समझ ही नही आई यह बात कि यह करेंसी वार है क्या। 2014 में मुल्क का नौजवान समझता था कि मोदी जी सब कुछ जानते हैं। अब मुट्ठी खुल चुकी है । यकीनन मोदी जी अर्थव्यवस्था के संदर्भ मे करेंसी के महत्व को नही जानते। नही तो कोई भी राष्ट्रअध्यक्ष जिसे अर्थशास्त्र की न्यूनतम समझ भी है वह करेंसी के फ्लो को अर्थव्यवस्था मे रोकने की भूल नही कर सकता। कभी एक दिन की बैंकों की हड़ताल हो जाती तो अरबो रुपये के नुकसान के अनुमान तैरते थे। नोटबन्दी तो पूरे 100 दिन की हड़ताल साबित हुई । इस सौ दिन की हड़ताल ने भागती दौड़ती अर्थव्यवस्था को ऐसे ब्रेक लगाए कि रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था आपके एक ही फैसले से रोजगार खाने वाली अर्थव्यवस्था मे तब्दील हो गयी। रोजगार से सम्बंधी एजेंसियों के आंकड़े क्या देश के युवाओं को औऱ युवा देश के भविष्य की भयावह तस्वीर नही दिखा रहे? बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान गिर रहे हैं। बैंकों का npa बेतहाशा बढ़ रहा है। सरकार आम जनता के टैक्स के पैसे से npa write off करने का फैसला करने को मजबूर है। जब तमाम चीजें GST के दायरे में आ गयी तो पेट्रोलियम उत्पाद ही बाहर रखने की अनैतिकता क्यो की गई। जनता को लुटेरा कह कर नोटबन्दी की गई , खुद सरकार ने पेट्रोलियम उत्पाद पर अनैतिक कर की लूट की और इस धन को अनाप शनाप बर्बाद किया। इसलिए मोदी जी को नही आना चाहिए।

नरेन्दर मोदी को इसलिए भी नही आना चाहिए क्योंकि 2014 में युवा ऐसा मान रहे थे कि 1990 में उदारीकरण के बाद देश में विकास का ढांचा तो बना लेक़िन वह विकास आम जनता तक नही पहुंचा। मोदी जी कोई ऐसा मॉडल पेश करेंगे कि पूर्ववर्ती सरकारों के बनाये ढांचे पर नया खेल रचेंगे जिससे कि विकास की बयार नीचे तक बह निकलेगी। लेकिन मोदी जी ब्रांडिंग मैन ही साबित हुए। उनके मॉडल मे स्मार्ट सिटी है, स्मार्ट विलेज नही हैं जो भयंकर रोजगार पैदा करने की कैपेसिटी में आ सकते हैं । जो शहरों पर दबाव कम कर सकते हैं । लेकिन मोदी जी नही जानते थे कि जब उन्होंने नोटबन्दी की तब कुल एटीएम की संख्या 2 लाख थी। शहर मे अनगिनत एटीएम होते हैं। साढ़े छह लाख गांव हैं देश मे 5 लाख गांव एटीएम की पहुंच से ही दूर हैं। 5 लाख गांवो में बैंक शाखा ही नही है। नोटबन्दी का फैसला तो दूरदर्शी नही ही था, जनधन खाते खोलने का काम भी बैंक मित्रों से करवाया गया। पांच साल मे आधे जनधन खाते तब से अब तक बिना ट्रांसेक्शन के पड़े रहे। क्योंकि बैंकिंग ही पहुंच मे नही है।

मोदी जी के मॉडल में बुलेट ट्रेन है लेकिन रेलवे का पुनर्निर्माण नही है । मोदी जी के मॉडल मे सस्ता और आरामदायक पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन नही है।
मोदी जी के मॉडल मे युवाओं के लिए सस्ता डेटा है, लिंचिंग है, राष्ट्रवाद है। जब पूरा विश्व विकास की नई इबारत लिख रहा है तब हम गौ, जाति,धर्म, मुसलमान हिन्दू, राष्ट्रवाद आदि वाहियात मसलों में उलझा दिये गए हैं। तमाम सरकारी अदारे, स्वायत संस्थाएं कमजोर हो रही हैं, निजी उद्योगपतियो को प्रश्रय दिया जा रहा है। राष्ट्र को खोखला करने के लिए इनमें से एक कारण भी बहुत हैं, इधर तो सब एक साथ विद्यमान हैं।

राष्ट्र को नरेन्दर मोदी जी की बन्द मुठ्ठी के नकली हीरे की असलियत मालूम हो गयी है। फिर भी लोग अपने पैर कुल्हाड़ी मारना चाहें तो शोंक से मारे। आखिर दर्द बर्दाश्त करने की सीमा हम भारतीयों की विश्व मे सबसे ज्यादा है। हम अवतारों की परिकल्पना मे अपने ही घड़े हुए अवतारों से पिटते हैं और अच्छा होने की आसमानी कल्पना में खोए कष्ट दूर हो जाने की कामना करते हैं। कष्ट कामनाओं से नही सही जगह वोट देने से खत्म होते हैं।

70 साल के मुल्क में अब काम करने वाली युवा आबादी है जो मुल्क को तमाम अर्थव्यवस्थाओं से आगे ले जा सकती है। देश के भीतर साढ़े छह लाख गांवों में अभूतपूर्व निर्माण कार्यो की सम्भावना है। देश के भीतर अकूत रोजगार की सम्भावना है। कितना काम बाकी है । लेकिन हमें हिन्दू-हिन्दू, मुसलमान-मुसलमान करने के काम में लगा दिया गया है।
साथ साथ अली बजरंग बली में लड़ाई का हथियार तैयार कर दिया है खास बात यह है कि 600 सिनेमा जगत में कार्य करने वाले सिनेमा के कलाकारों ने बीजेपी को वोट नहीं देने की अपील देश की जनता से की 5000 हजार पूर्व सेना के अधिकारियों जवानों ने संसद में प्रदर्शन कर सरकार का को वोट नहीं देने के लिए देश की जनता को संदेश देने का कार्य कर  दिया जिसे tv पर नहीं दिखाने के लिए मोदी सरकार के प्रबंधन का दबाव रहा है। क्योंकि  बीजेपी ने अपने जनता से किये वायदे पूरे नहीं कर सके। जब स्मार्ट सिटी नहीं बनी  बेरोजगारी दूर नहींहुई तो वोट नहीं देकर अपने जीवन में लोकतंत्र की रक्षा करने का काम जनता को करना होगा।

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