7वीं शताब्दी में चांदपुर गढ़ी से श्री मां भगवती नंदा को बारह बर्ष में मायके से कैलाश भेजने की परंम्परा शुरु करने की मान्यता है

चमोली(उत्तराखंड) 7 वीं शताब्दी में राजधानी चांदपुर

गढ़ी से श्री मां भगवती नंदा को बारह बर्ष में मायके से कैलाश भेजने की परंम्परा शुरु करने की मान्यता है कि चमोली जिले के चांदपुर क्षेत्र मां का माइका और बधाण क्षेत्र ससुराल कहलाता, एशिया की सबसे लम्बी पैदल यात्रा जिसमें होते 20 पडाव और 280 किमी यात्रा जो गढ़वाल कुमाऊं की धार्मिक ही नही सांस्कृतिक विरासत भी, कुमायूं के कत्यूरी राजवंश और गढ़वाल राजाओ की आराध्य इष्ट देबी मां नंदा, हर 12 बरसो में आयोजित होती मां नंदा राजजात चमोली के कर्ण प्रयाग तहसील के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुड जिसे मां का ससुराल कहा जाता वापस नौटी आकर संम्पन होती, अद्भुत है मां को बिदा करने की रीति कोई बेटी- बहन -सखी के रूप मे मां से रिश्ता जोड़ अश्रुपूर्ण बिदाई करते , डोली में मां की बिदाई बेटी की तरह ही होती, महिलाए करती श्रृंगार की हर वो वस्तु भैट जो ससुराल जाती बेटी को उपहार स्वरुप की जाती, चार सींगो वाला भेड़ ‘चौसिगाखाडू’ करता पूरी यात्रा की अगुवाई, मां की कृपा से पैदा होता चौसीगा भेड़ जिस गौशाला में अवतरित होता वहां आने लगता शेर जब भेड़ का मालिक कह देता मां नंदा को भैट करूंगा तब से बाघ आना बंद कर देता, मां का श्रृंगार का सारा सामान लाद श्रृदालुओ संग सबसे आगे चलता भेड़, मां नंदा की कृपा देखें हजारों हुजुम को साथ लाया भेड़ होमकुण्ड से अकेला मां की सेवा में कहीं अदृश्य हो जाता, । -मदन पैन्यूली

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