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शताब्दी समारोह का भव्य समापन, युग-परिवर्तन का सशक्त संदेश ।

Pahado Ki Goonj

समारोह का भव्य समापन, युग-परिवर्तन का सशक्त संदेश ।

हरिद्वार । रिपोर्ट मदन पैन्यूली
गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की साधना के सौ वर्ष, माता भगवती देवी शर्मा की जन्मशताब्दी तथा सिद्ध अखण्ड दीप के प्राकट्य के सौ वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर आयोजित शताब्दी समारोह आज भव्यता, गरिमा और आध्यात्मिक चेतना के साथ सम्पन्न हुआ।
शताब्दी समारोह के प्रथम चरण में निकाली गई ज्योति कलश यात्रा अपनी मातृसंस्था शांतिकुंज पहुँची। उल्लेखनीय है कि यह ज्योति कलश यात्रा भारत सहित ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका समेत 20 से अधिक देशों में सम्पन्न हुई, जिसके माध्यम से गायत्री परिवार का संदेश वैश्विक स्तर पर जन-जन तक पहुँचा।
मातृ समर्पण समापन समारोह के मुख्य अतिथि उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने शताब्दी समारोह को युग-परिवर्तन का सशक्त संकेत बताते हुए कहा कि यह आयोजन नवयुग के शुभारंभ की घोषणा है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार का मूल संदेश — “हम बदलेंगे तो युग बदलेगा” — आज ब्रह्मांडीय आदेश के रूप में सामने आ रहा है।
माननीय राज्यपाल ने भगवान शिव के त्रिशूल की उपमा देते हुए विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत को उसके तीन स्वरूप बताया। उन्होंने वसुधा वंदन समारोह से लेकर समापन तक चली 51 दिवसीय यात्रा को चेतना-जागरण और नवयुग-निर्माण की यात्रा बताया तथा साधकों से सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के भाव से अपने जीवन और विचारों को जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने ज्योति को युग-परिवर्तन का प्रतीक बताते हुए साधकों एवं स्वयंसेवकों के समर्पण की सराहना की और गायत्री मंत्र को आत्मा एवं ब्रह्मांडीय चेतना के मिलन का दिव्य माध्यम बताया।
समारोह के दलनायक डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने इस ऐतिहासिक अवसर को “सौभाग्य की त्रिवेणी” बताते हुए माननीय राज्यपाल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा समस्त गायत्री साधकों का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि आज आध्यात्मिकता को सोशल मीडिया के ‘लाइक्स’ से आँका जा रहा है, जबकि सच्ची साधना चमत्कार नहीं, परिष्कार का मार्ग है। गुरु अनेक हो सकते हैं, किंतु पिता समान गुरु वर्षों की प्रतीक्षा के बाद ही प्राप्त होते हैं।
डॉ. पण्ड्या ने कहा कि प्रकाश के लिए आँखें खोलनी पड़ती हैं और जिसने भगवान को दिया है, वह कभी खाली हाथ नहीं रहता। अंत में उन्होंने जीवन में ग्रहणशीलता विकसित करने तथा साधना और सेवा को सार्थक बनाने का संदेश दिया।

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