HTML tutorial

पुलिस हमारे समाज की रीढ़ है जो हमारी सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है;पद्मश्री प्रकाश सिंह जानिए सभी समाचार

Pahado Ki Goonj

पुलिस हमारे समाज की रीढ़ है जो हमारी सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । लेकिन आज 21 वीं सदी में हमारी पुलिस खुद ही विभिन्न समस्याओं से घिरी हुई है

(पद्मश्री प्रकाश सिंह)

,(पत्रकार अंकित तिवारी)

भ्रष्टाचार व अपराध आदि समस्याओं से निपटने के लिए पूरी तरह से मजबूत नहीं दिखती । समय समय पर न्यायालय में दर्ज जनहित याचिकाओं पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी और मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट से ये सवाल उठने लगता है कि क्या पुलिस में सुधार की जरूरत है। इन्हीं सारे विषयों पर पुलिस सुधार के सूत्रधार कहे जाने वाले, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता, उत्तर प्रदेश व आसाम के पूर्व डीजीपी और बीएसएफ के डीजी व इंडिया पुलिस फाउंडेशन के अध्यक्ष रह चुके पद्मश्री प्रकाश सिंह जी से पत्रकार अंकित तिवारी ने विस्तृत बातचीत की

प्रश्न : पुलिस व्यवस्था में सुधार क्यों जरूरी है?
उत्तर :
पुलिस व्यवस्था में सुधार इसलिए जरूरी है कि जो व्यवस्था वर्तमान में चल रही है, वह वही व्यवस्था है जो ब्रिटिश सरकार ने अपने लिए वर्ष 1861 में बनाई थी। उसका मुख्य उद्देश्य ऐसे पुलिस व्यवस्था की स्थापना था जो उनके आदेशानुसार काम कर सके व उनके साम्राज्य की पकड़ को और मजबूत कर सके। जब भी साम्राज्यवाद को कोई खतरा हो तो उसको कुचल सके। अंग्रेजों का जो भी आदेश हो, सही या गलत हो, जनहित में हो या न हो, पुलिस उन आदेशों का पालन करे। वही व्यवस्था, मतलब आजादी से वही आज तक चली आ रही है। बीच में सुप्रीम कोर्ट का कुछ आदेश हुआ है तो उसके आदेशो कुछ परिवर्तन लाने का स्वांग रचा गया है। , यह मैं जोर देकर कहना चाहूंगा। परिवर्तन का स्वांग रचा गया है सुप्रीम कोर्ट को दिखाने के लिए कि हम आपके आदेश का पालन कर रहे हैं। परंतु वास्तव में अगर उनके आदेशों का गहन परीक्षण किया जाए तो पाया जायेगा कि जो वर्तमान व्यवस्था है, उसमें कोई आमूल परिवर्तन नहीं हुआ है और कुछ कागज पर खेल, खेल करके सुप्रीम कोर्ट को यह बताने की कोशिश की गई कि हम आपके आदेशों का पालन कर रहे हैं, जबकि वास्तव में जमीनी स्थिति वही है। इसलिए इस ढांचे को बदलना बहुत जरूरी है। विकसित भारत की कल्पना करते हैं मोदी जी, तो विकसित भारत के लिए एक पुलिस भी विकसित करनी पड़ेगी और उसे, जो औपनिवेशिक ढांचा है, कोलोनियल स्ट्रक्चर है उसे,उसको निकालना पड़ेगा।
प्रश्न :
पुलिस सिस्टम में किस प्रकार के सुधार की जरूरत है ?

उत्तर :
कुछ तो संस्थागत सुधार की जरूरत है। संस्थागत और कुछ ऐसे सुधार की जरूरत है जो, मतलब, मतलब उसमें जो वर्तमान व्यवस्था है, उसी, उसी में सुधार की जरूरत है। संस्थागत स्तर पर जो परिवर्तन है, वह मुख्य रूप से तीन हैं, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है। एक तो यह कि स्टेट सिक्योरिटी कमीशन का गठन हो। स्टेट सिक्योरिटी कमीशन एक ऐसी बॉडी होगी जो यह सुनिश्चित करेगी कि जो राजनेता हैं, जो पॉलीटिकल क्लास है वह पुलिस के काम में दखल न दे सके। दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करेगी कि पुलिस विभाग अपनी तरफ से जो कानून की सीमा है उसको लांघकर कोई काम ना करें। पुलिस के ऊपर भी अंकुश लगाएगी और नेताओं पर भी अंकुश लगाएगी ताकि दोनों अपने, अपने दायरे में रहकर काम करें। स्टेट सिक्योरिटी कमीशन इसके अलावा एक पुलिस एस्टैब्लिश्मेंट बोर्ड की स्थापना की बात की गई है। एस्टैब्लिश्मेंट बोर्ड ऐसा हो जिससे कि पुलिस को अपने जो पर्सनल मैटर्स होते हैं, जो कार्मिक मामले होते हैं, उसमें उनको एक स्वायत्तता हो और डिप्टी एसपी तक के अधिकारियों को वह पोस्टिंग ट्रांसफर जहां करना चाहें, करें। कम से कम इंस्पेक्टर रैंक के तो पूरा सर्वाधिकार हो। डिप्टी एसपी के बारे में यह हो कि हां उनमें भी परिवर्तन कर सकते हैं और एसपी के ऊपर जो हो, एसपी और उनसे ऊपर जो है, उसके बारे में यह कि यह बॉडी जो है अपने रिकमेंडेशन देगी और कहेगी कि ऐसा किया जाना चाहिए। उसमें परिवर्तन राज्य सरकार कर सकती है। और जब परिवर्तन करेगी तो अपने कारण बता देगी। भाई इस कारण से हम आपको इस रिकमेंडेशन में इन संस्तुतियों में हम परिवर्तन ला रहे हैं। तो यह तीसरी संस्थागत परिवर्तन के बाद की पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी का गठन पुलिस शिकायत के गठन राज्य स्तर पर और जिला स्तर पर, राज्य स्तर पर यह जो कंप्लेंट अथॉरिटी है, इनका चेयरमैन एक रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज हो और जिला स्तर पर एक रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट सेशन जज होगा और जज साहब के सहयोग के लिए दो तीन आदमी और होंगे जो जिनकी ख्याति अच्छी होगी और उनका चयन राज्य सरकार करेगी। यह लोग जज साहब की सहायता के लिए रहेंगे। यह तीन संस्थागत परिवर्तन है। इसके अलावा और भी बहुत कुछ हैं, जैसे वर्तमान व्यवस्था चल ही रही है। आपकी जो रिक्तियां हैं, रिक्तियों को भरिए। आज की तारीख में करीब छह लाख रिक्तियां हैं। पुलिस फोर्स में पूरे हिंदुस्तान भर में ये रिक्तियां भरी हैं और फिर इसके अलावा अब जो रिक्तियां हैं इनका सैंक्शन, जो है स्वीकृतियां, किसी की 10 साल पहले हुई है, किसी की 20 साल पहले हुई हैं, उनको भी फिर से रिव्यू करने की जरूरत है, उनका भी पुनरावलोकन की आवश्यकता है । पुलिस बल की संख्या में वृद्धि की जरूरत है। वृद्धि की जरूरत क्यों नहीं है? क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है, औद्योगीकरण बढ़ रहा है, शहरीकरण बढ़ रहा है, गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। यह सब जब बढ़ रहा है तो अपराध भी बढ़ेगा। तो कितनी स्वीकृति होनी चाहिए उसका भी, उसका भी पुनरीक्षण की जरूरत है। अब इसी तरह पुलिस में बहुत सारी चीजें हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर इसका कमजोर है। थानों की स्थिति अच्छी नहीं है। वहां पर जो उपकरण होने चाहिए, उपलब्ध नहीं है। मतलब ट्रांसपोर्ट, गाड़ियों की कमी है। कम्युनिकेशन, संचार व्यवस्था में और सुधार की जरूरत है। फॉरेंसिक लेबोरेटरीज की कमी है । हाउसिंग की कमी है। यह सब चीजें भी आप इनमें भी बढ़ोत्तरी होनी चाहिए और आज की जो चुनौतियां है उसके अनुसार और पुलिस बल की जो संख्या है उसके अनुसार ये अन्य सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए।

प्रश्न :
इस संबंध में जो कमेटियां बनी उनकी सिफारिशों पर अब तक कितनी कार्रवाई सरकार ने की है ?

उत्तर :
कार्रवाई तो देखिए, कमेटियां तो बहुत सारी बनी हैं। कमेटियां कुछ अंशकालिक होती हैं, कुछ कॉस्मेटिक कार्रवाई होती है। तो कुछ दिखाने के लिए होती है। पर जो मुख्य जरूरत है वह यह कि पुलिस को अपने काम करने में स्वायत्तता हो। देखिए मैं स्वायत्तता शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं, स्वतंत्रता नहीं कह रहा हूं। जो स्वायत्तता होनी चाहिए, वो नहीं है। परिसरों, पुलिस के रोज के काम में जो उपनेताओं से दखल होता है, उसकी वजह से पुलिस को काम करने में बहुत दिक्कत होती है और देखिए थोड़ा बहुत गाड़ी की संख्या बढ़ गई, थोड़ा बहुत जनसंख्या बढ़ गई, एकाध लेबोरेटरी खुल गई। ये सब, अब परिवर्तन तो सरकार को करने में दिक्कत नहीं होती है, ये कर देते हैं वो। परंतु जो सबसे बड़ा परिवर्तन होना चाहिए वह यह कि पुलिस को अपने काम राजनैतिक दखल से मुक्ति हो । एक काम करने की परिस्थिति होनी चाहिए। वो नहीं बन पा रही है, उसके लिए कोई राज्य सरकार सहमत नहीं है।

प्रश्न :
क्या पुलिस थानों का स्वरूप बदलने की भी जरूरत है सर ?
उत्तर :
पुलिस थानों का स्वरूप बदलने की जरूरत है, इस मायने में कि देखिए पुलिस थानों के भवन ज्यादातर जर्जर हालत में है। आप कहीं जाइए तो ठीक है ,, बिल्डिंग रहेगी पर बिल्डिंग कितनी अच्छी है ये आपको देखने की जरूरत है। मतलब आंगतुको को बैठने के लिए कोई कमरा नहीं होगा। अब तो खैर जरा हालत इतनी बुरी नहीं। मतलब दस – पंद्रह, साल पहले तक तो यह हालत थी, कुछ थाने में हवालात तक नहीं थे। तो किसी खिड़की के छड़ से आदमी मुल्जिम को बांध दिया या अगर हवालात है भी है तो शौचालय की स्थिति ठीक नहीं है। शौचालय मतलब अब उसी में शौच भी करेगा, उसी में रहेगा भी। ये स्थिति ठीक नहीं है। शौचालय अलग होना चाहिए। पुलिस थाने की हालत बड़ी मतलब क्या कहें, सामंतवादी तरीके के जो बने थे थाने वही चले आ रहे हैं। कुछ थानों का नवीनीकरण हुआ है पर इसमें बहुत ज्यादा काम की जरूरत है और थानों को नए स्तर से एक मॉडल थाने का एक स्ट्रक्चर होना चाहिए और सब थानों में वो सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए। अभी एक संस्था कॉमन कॉज की एक रिपोर्ट आई है जिसमें स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया मतलब पुलिस के संबंध में उसमें दिया गया है। कितने थाने ऐसे हैं जहां आंगतूको को बैठने की जगह नहीं है, कितने थाने ऐसे हैं जहां टॉयलेट नहीं है, कितने थाने ऐसे हैं जहां पानी पीने की सुविधा नहीं है। तो ये सब दिक्कतें हैं। थानों में बहुत परिवर्तन की जरूरत है और सबसे बड़ी बात थानों में, थानों के वातावरण में बदलाव की जरूरत है। वहां का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि शिकायती पत्र लेकर जो आदमी जाता है, कोई अपनी तकलीफ है और अपनी रिपोर्ट लिखाने तो उसको, उसके मन में कोई भय या संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारा काम यहां होगा या नहीं। उसको इस आत्मविश्वास के साथ आने में जाना चाहिए कि यहां हमारी शिकायत की सुनवाई होगी। उसकी रिपोर्ट दर्ज की जाएगी और उस पर यथासंभव कार्रवाई होगी ।

प्रश्न :
क्या पुलिस जांच पड़ताल प्रक्रिया के लिए बिल्कुल अलग विंग बनाना चाहिए ?

उत्तर :
अलग विंग जांच पड़ताल के लिए ये तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि देखिए बड़े बड़े शहरों में जहां की आबादी दस लाख से अधिक है, वहां पर इन्वेस्टिगेशन का काम और लॉ एंड ऑर्डर का काम अलग होना चाहिए। कारण यह है कि देखिए आजकल ज्यादातर जिलों में यह देखा जा रहा है कि रोज कोई ना कोई ऐसी स्थिति हो जाती है कि सारा स्टाफ उस लॉ एंड ऑर्डर को संभालने, नियंत्रण करने में लगा दिया जाता है। अब जैसे मान लीजिए कोई वीआईपी आ गया, मुख्यमंत्री आ गए या मंत्री या मंत्री जी के कोई खास आ गए जिले में। यदि छोटा जिला हुआ तो भैया देखो मंत्री जी का पहले काम देखो यार, डकैती बाद में देखी जाएगी, हत्या बाद में देखा जाएगा। मंत्री जी चले जाएं, फिर बाकी अपना काम करते रहना है। बड़े शहर में आप दिल्ली जैसे शहर में हैं या लखनऊ या मेरठ जैसे शहर में हैं तो मालूम हुआ हो चीफ मिनिस्टर आ गए, तो भाई सारा काम छोड़ो। अब चीफ मिनिस्टर साहब की विजिट ठीक से निकल जाए। या मान लीजिए दंगा हो गया, तो भाई दंगा का नियंत्रण करना जरूरी है। थोड़ा इन्वेस्टिगेशन छोड़ो, अपना मुकदमा छोड़ो। चलो सब लोग पहले दंगा नियंत्रण करो। या गढ़मुक्तेश्वर का मेला आ गया, भैया गढ़मुक्तेश्वर का मेला निकालना सही। कहने का मतलब ये कि लॉ एंड ऑर्डर की समस्याएं जनपदों में आमतौर पर उभरती रहती हैं और उन समस्याओं से निपटने के लिए जिले के पुलिस अधिकारी या डी-डीआईजी रेंज वगैरह को यह परेशानी रहती है कि क्योंकि हमारे पास पुलिस बल में ऐसे ही कमी है और इस-और इतने आदमी जनसंख्या बढ़ गई है। समस्याएं बढ़ जाती हैं। दंगे ज्यादा विकराल हो रहे हैं पहले से, तो उसको निबटना ज्यादा जरूरी है। और मुकदमा तो अब मतलब जिस हम तफ्तीश कर रहे हैं, जांच कर रहे हैं किसी मुकदमे की, तो वह तो भाई अब बीस दिन या चालीस दिन लगा देंगे। हम तीस दिन लगा देंगे। उसमें तो हम तो कह देंगे, कोई पूछने वाला नहीं है ज्यादा। पर यहां तो कुछ स्थिति में गड़बड़ हो गया। अगर चार आदमी मर गए, छह आदमी मर गए तो हमारा जवाब तलब होगा, सस्पेंड हो जाएगा । इसलिए लॉ एंड ऑर्डर में सारा स्टाफ डाइवर्ट हो जाता है। जो इन्वेस्टिगेशन करने वाला स्टाफ है, वह भी लॉ एंड ऑर्डर में लग जाता है और बाकी लोग तो लगे ही हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सब पुलिस में जो कमियां हैं, मतलब बल की कमियां हैं, आदमियों की कमियां हैं, उसको पूरा किया जाए ताकि लॉ एंड ऑर्डर का काम अलग चलता रहे, इन्वेस्टिगेशन का काम अलग चलता रहे क्योंकि इन्वेस्टिगेशन का काम इस वजह से बहुत सफर करता है।
प्रश्न
, जनता पुलिस के संबंधों में किस तरह से सुधार हो सकता है?
उत्तर जनता और पुलिस के जो पॉइंट्स ऑफ कांटेक्ट हैं वहां पर पुलिस का रिस्पांस अच्छा हो। पुलिस ने जैसे मैंने बताया थाने में रिपोर्ट लिखाने जाते हैं तो थाने में रिपोर्ट चलिए बाद में लिखी जाएगी। पहले कम से कम बैठने की जगह हो। कोई आदमी रोता गाता आ रहा , कोई आदमी बहुत थका दौड़ा भागा आ रहा है। चलो भैया पानी पी लो, चाय पी लो। पहले तो आप उसके प्रति व्यवहार अच्छा हो, फिर उसकी बात को सहिष्णुता से, सहृदयता से सुनिए और उसकी रिपोर्ट में जो कुछ प्रारंभिक, कुछ पूछना हो और जांच करके आप तुरंत उसकी रिपोर्ट दर्ज करिए। सबसे बड़ा पॉइंट ऑफ कांटेक्ट है। आधी जनता तो इसी बात से परेशान रहती है कि हमारी रिपोर्ट लिखी जाएगी कि नहीं लिखी जाएगी। तो रिपोर्ट अच्छी सी लिखी जाए। व्यवहार, सहृदयता का हो, हमदर्दी का हो, सांत्वना देने का हो। व्यवहार में परिवर्तन चाहिए। ट्रैफिक पर हैं आप बिना मतलब स्कूटर वालों को रोक कर पैसा वसूलते हैं। क्यों पैसा वसूलते हो यार ? मोटर वाले को तो रोकते नहीं हो। देखिए आप शहरों में, देखिए बड़े बड़े शहरों में ऐसा भी होता है। जितनी छोटी गाड़ी है, जितने कम हैसियत का आदमी है उसकी सबसे ज्यादा चेकिंग होती है और उसी का सबसे ज्यादा चलान भी होता है और पैसे वसूले जाते हैं। पैसा क्यों वसूलते हो भाई ? करप्शन क्यों, जब तुम्हें तनख्वाह, अच्छी खासी तनख्वाह मिल रही है। अब तो पुलिस वालों को भी मतलब कोई यह नहीं कह सकता कि हमें कब तनख्वाह मिलेगी। तनख्वाह सरकार अच्छी खासी दे रही है। मतलब लोगों को प्रताड़ित मत करो। लोगों को यह नहीं लगे कि जबरदस्ती पैसे की उगाही हो रही है तो यह मतलब जहां पॉइंट ऑफ कांटेक्ट है, वहां पब्लिक की जो अपेक्षाएं हैं, उन अपेक्षाओं पर खरा उतरें । उनके साथ विनम्र व्यवहार हो, सहृदयता का व्यवहार हो, हमदर्दी का व्यवहार हो, उनकी रिपोर्टें लिखी जाए। यह तो अपने आप तो पुलिस और जनता के संबंधों में सुधार आ जाएगा।

प्रश्न :
पुलिस व्यवहार में किस तरह से सुधार संभव है ?

उत्तर :
पुलिस व्यवहार में सुधार संभव है। पहली बात तो बड़े अफसर ही इसका मतलब अपना उदाहरण प्रस्तुत करें कि हम अप्रोचेबल हैं, एक्सेसिबल हैं। आदमी हमसे मिल सकता है, हमसे शिकायत कर सकता है। सोशल मीडिया पर मैंने देखा कि कोई रेप पीड़िता थी। उसको पुलिस वाले डीआईजी साहब से मिलने नहीं दे रहे थे। फिर वह भाग कर गई और डीआईजी साहब पर पहुंच गई और सारे पुलिस वाले उसे रोकने गए । पुलिस अधिकारियों को एक्सेसिबल होना चाहिए। उनसे जनता के बीच जो मिलना चाहे, मिल सकते हैं, उनकी बात सुन सके। उनकी बात की सुनवाई हो। पुलिस का व्यवहार मतलब सीनियर अफसर को शानदार प्रस्तुत करना हो फिर इस बात के लिए अपनी तरफ से ट्रेनिंग इंस्टिट्यूशंस में जितने भी पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज है वहां इस बात पर सब सिपाही, दरोगा और सबको इस बात का इस बात पर जोर दें कि तुम्हें पुलिस जनता के साथ विनम्र होने की आवश्यकता है और कैसे तुम अप्रोच करो, कैसे उनसे बात करो। बजाय इसके कि धौंस दिखाओ, दादागिरी करो और जबरदस्ती वसूलो। तो इस पर सिखलाई होनी चाहिए ट्रेनिंग में उनको और इसका उदाहरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए।जो गलत व्यवहार करें फिर उनको कुछ उनको उनको भी दंडित होना चाहिए।

प्रश्न :
पुलिस की हरकतों पर निगाह, निगरानी, निरीक्षण की कितनी व्यवस्था है और क्या यह पर्याप्त है ?

उत्तर :
देखिए, व्यवस्था तो पूरी है पर सवाल ये है कि वो व्यवस्था काम नहीं कर रही है। अब निगरानी के लिए तो भाई इतने सारे अफसर हैं मतलब विभिन्न स्तरों व्यवस्था है। अब सिपाही पर निगरानी के लिए दरोगा है, दरोगा के निरीक्षण देखने के लिए इंस्पेक्टर है, इंस्पेक्टर को देखने के लिए फिर डिप्टी साहब हैं, डिप्टी साहब हैं, एसपी साहब हैं, एसपी साहब हैं, यानि निगरानी की व्यवस्था तो हर स्तर पर है। पर सवाल यह है कि क्या यह लोग अपना काम और अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहे हैं ? नहीं निभा रहे हैं। इस समय मैं तो यही कहूंगा कि पर्यवेक्षण कमजोर है। पर्यवेक्षण यानी सुपरविजन कमजोर है। जिसकी वजह से नीचे का तबका जो है, जगह जगह पर निरंकुश हो जाता है। अगर अगर सुपरविजन स्ट्रिक्ट हो और यह है कि जो supervisory ऑफिसर है वह खुद एक उदाहरण दूसरे के सामने प्रस्तुत करें कि नहीं, हम गलत काम न करेंगे और न करने देंगे। न हम पैसा लेंगे, न तुम्हें पैसा खाने देंगे। तुमको तुमको पैसा उगाही नहीं करने देंगे। इस तरह का एटीट्यूड अगर सीनियर अफसर में आ जाए तो फिर नीचे का उसके नीचे वाला तबका अपने आप ठीक हो जाता है। भैया ऊपर बैठे हैं, हमारे ऊपर सिर पर सवार बैठे हैं। यह तो हमको खा जाएंगे। जब यह फीलिंग आती है तो फिर आदमी डर के रास्ते पर आ जाता है। पर जब यह है कि भाई कप्तान साहब खुद ही खा रहे हैं तो चलो हम भी बहती गंगा में हम भी हाथ धोएंगे या डीजी साहब खुद ही खा रहे हैं तो फिर बाकी लोग भी खाएंगे। यह समस्या है यह। हर लेवल पर सीनियर अफसर को निष्पक्ष होना पड़ेगा। बेदाग होना पड़ेगा, निष्कलंक होना पड़ेगा और ऑफिसर्स को अपने अपने आचरण द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।

प्रश्न :
कमजोर निम्न वर्ग के लोगों के लिए के साथ पुलिस का व्यवहार इतना घटिया क्यों होता है सर?
उत्तर :
इसलिए उनको कोई बोलने वाला नहीं है। उनके कोई सुनने वाला नहीं। उनका कोई, उनका कोई गॉडफादर नहीं है तो उनको जितना चाहे मार लो, पीट लो और अपना जो नौकरी का जो फ्रस्टेशन है और जो अपनी जो अपनी जो दबी हुई है वह सब उठाएं, वह सब निकाल देते हैं। अब उनको सोचते हैं कि भाई, एक तो एक तो देखिए, पुलिस का आदमी यह समझ लीजिए ओवरवर्क्ड है, अंडरस्टाफ है, स्टाफ कम है, ओवरवर्क्ड है और उसके काम में दखल बहुत है। कुल मिलाकर उस पर जो स्ट्रेस और स्ट्रेन है, उस पर जो काम का जो दबाव है, इतना ज्यादा रहता है कि यदाकदा वह संतुलन खो जाता है। उससे संतुलन की अपेक्षा होती है, जिस अच्छे व्यवहार की अपेक्षा होती है। ये बैलेंस सबसे ज्यादा खोता तब है जब उसके सामने कमजोर आदमी होता है कि यहां पर हम जो चाहे करें, हमें कोई पूछने वाला नहीं है और कहीं कुछ किया तो भाई पता नहीं आजकल कहीं कोई वीडियो खींच कर शिकायत भेज देगा, कहीं कोई अपनी पहुंच से शिकायत कर देगा। तो जो आदमी कमजोर है, जिनका कोई राजनैतिक दबाव नहीं है, जिनके पास पैसे की ताकत नहीं है, उन पर अपनी ताकत दिखाते हैं, अपना दम जमाते हैं और अपना फ्रस्ट्रेशन निकालते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर पुलिस की वर्किंग कंडीशंस अच्छी हो, पुलिस की हाउसिंग अच्छी हो, पुलिस के काम में दखल ना हो, पुलिस की खुद की दिक्कतें समझी जाए तो दूसरों के प्रति भी उसका व्यवहार अच्छा होगा। अब कोविड के टाइम हमने देखा कि पुलिस का व्यवहार जनता के साथ बहुत अच्छा था। इसके मानिए पुलिस में मानवीय दृष्टि, मानवीय व्यवहार है और उसको मौका मिले हमें मतलब उदाहरण देखने को मिलता है। पर ये है कि वो मानवीय चेहरा जो है पुलिस का दब जाता है, क्योंकि अंडरस्टाफ है, ओवरवर्क है। बहुत स्ट्रेन है उस पर और वह काम को मतलब पगलाया रहता है कि सुबह से शाम तक कहां क्या काम करना है, क्या नहीं करना है।

प्रश्न :
अपराधियों से पुलिस की मिलीभगत पर कैसे काबू संभव है ?

उत्तर :
देखिए ऐसा है कि यह राजनैतिक मिलीभगत जब होती है तभी पुलिस की भी मिलीभगत होती है। समझे आप, आज तो राजनीति इतनी गंदी हो गई है कि पार्लियामेंट में भी, आपके एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मुताबिक 44% आदमी अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग हैं। जब ये अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं तो इनकी तो अपराधियों से सांठगांठ हो गई और राजनेता की जब सांठगांठ हो गई तो भाई पुलिस इन सांठगांठ वाले नेता को भी बचाती है और इन अपराधियों को भी बचाती है। बचाने का मतलब फिर पुलिस की भी सांठगांठ हो गई। सांठगांठ का जड़ जो है वह राजनैतिक है और पुलिस और जब तक देश की व्यवस्था द्वारा बर्बाद आदमियों को संरक्षण मिलेगा, तब तक पुलिस की भी सांठगांठ होती रहेगी।

प्रश्न :
पुलिस में भ्रष्टाचार का नियंत्रण कैसे संभव है?

उत्तर :
भ्रष्टाचार का नियंत्रण तो देखिए। मैंने बताया ना कुछ एंटी करप्शन एजेंसी तो है, एंटी करप्शन ऑर्गनाइजेशन है, विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन है यह सब ऑर्गनाइजेशन है। पर इन ऑर्गनाइजेशन से बढ़कर मैं कहता हूं अफसर, अफसर अगर ईमानदार हो, भाई थाने पर अगर एसएचओ ईमानदार हो जाए, सब डिवीजन स्तर पर अगर डिप्टी साहब और एसपी साहब ईमानदार हो जाए, जिला स्तर पर अगर एसीपी साहब ईमानदार हो जाए, रेंज स्तर पर डीआईजी साहब ईमानदार हो जाए, जोन स्तर पर एडिशनल डीजी साहब या आईजी साहब ईमानदार हो जाए और राज्य स्तर पर डीजी साहब ईमानदार हो जाए तो मजाल है कि नीचे वाला बेईमानी करेगा। मजाल नहीं है। और तो और जो बेईमानी करेगा वह दहशत में रहेगा कि भैया कहीं पकड़ न लिया जाए, कहीं पकड़ा न जाऊं। परंतु इस समय व्यवस्था इतनी दूषित हो गई है कि सुपरवाइजरी अफसर जब चोरी कर रहा है तो नीचे वाला भी चोरी कर रहा है। उसके नीचे वाला भी चोरी कर रहा है। कहता है भाई जी ऊपर वाला जब कर रहा है और ऊपर वाला हमसे मांग रहा है तो मैं कहां से लाऊंगा। मैं भी चोरी करूंगा, मैं भी लोगों से उगाही करूंगा। सीनियर अफसर का रोल बहुत जरूरी है। सीनियर अफसर अगर अगर एसएचओ शुद्ध हो जाए, अगर सब डिविजनल अफसर शुद्ध हो जाए, अगर एसपी साहब शुद्ध हो जाए तो मजाल है जिले में कुछ गड़बड़ होगा ही नहीं। हर जगह कहीं न कहीं कमजोरी रहती है।

प्रश्न :
महिला पुलिसकर्मियों के सामने क्या चुनौतियां हैं ?

उत्तर :
महिला पुलिसकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां यह है कि आजकल अभी पहले जब भर्ती होती है तो उनकी संख्या में भी कम है तो ज्यादातर आदमियों से घिरी रहती हैं। अब उनआदमियों में कई भेड़िये हैं, कोई बदमाश है, कोई लुच्चे लफंगे भी होते हैं। इसलिए बहुत सी जगह अब एसीपी साहब चाहते हैं कि इनको ऐसा काम दो जो डेस्क जॉब हो। लोगों की शिकायतें सुने या वायरलेस में बैठ जाएं या टेलीफोन ड्यूटी पर बैठ जाएं या दफ्तर में बैठ जाए। फील्ड में भेजने में मतलब औरतें काम तो कर सकती हैं, पर यह जो इनके इर्द गिर्द भेड़िए रहते हैं, यह कहीं मतलब दूसरी समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। मतलब बजाय इसे कि आप बाहर भ्रष्टाचार की शिकायत देखने जाएं, आपको अपने विभाग का भ्रष्टाचार पहले दूर करना पड़ेगा। इस तरह का जो है भ्रष्टाचार मतलब व्यभिचार तो समझिये कई जिलों, कई स्टेट से शिकायतें आई थीं मुझे याद है जब मैं पुलिस फाउंडेशन का चेयरमैन था। उसके हिसाब से रात में जब गश्त में औरतें निकलती हैं और मालूम हुआ कि दो लड़कियां हैं और छह आदमी हैं और वह छह आदमी दो लड़कियों को तंग कर रहे हैं रात में। क्या करें भाई रात में बहुत थकान हो गई है। बोरडम हो गया। कुछ एंटरटेनमेंट होना चाहिए। इस तरह की बातें होती हैं तो मतलब लड़कियों के लिए खासतौर से कांस्टेबल रैंक पर जब तक उनकी संख्या में वृद्धि नहीं हो जाएगी, कम से कम 35 परसेंट ना पहुंच जाए, स्थिति नहीं सुधरेगी। अभी तो बहुत कम है। देखिए मुश्किल से 10% या कुछ ऐसी परसेंटेज है तो संख्या कम होने की प्रॉब्लम है। जब ये संख्या आदमियों के बराबर होने लगेगी या 33 परसेंट भी पहुंच जाएगी, तो अंतर पड़ेगा, तब तक यह उनके शोषण की समस्या है, वह कम हो जाएगी। लड़कियां फील्ड वर्क अच्छा कर सकती हैं और अच्छा करने का नमूना भी उन्होंने दिया है। परंतु जरा सा उनकी संख्या में बढ़ोतरी की जरूरत है।

आगे पढ़ें

[13/12, 8:50 pm] +91 94101 89723: *शीतकालीन पर्यटन को नई रफ्तार: सीएम धामी ने स्नो लेपर्ड साइटिंग, हेली-स्कीइंग और हिमालयन कार रैली शुरू करने के दिए निर्देश*

*20 दिसंबर तक केएमवीएन–जीएमवीएन की सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के मुख्यमंत्री के निर्देश*

*सीएम धामी स्वयं सड़क मार्ग से करेंगे शीतकालीन पर्यटन व्यवस्थाओं का निरीक्षण*

‘ *वन डिस्ट्रिक्ट–वन फेस्टिवल’: हर जनपद में भव्य महोत्सव, राज्य स्तर पर अंतरराष्ट्रीय आयोजन का एलान*

*लद्दाख मॉडल पर उत्तराखंड में शुरू होगा स्नो लेपर्ड टूर, गंगोत्री क्षेत्र खुलेगा शीतकालीन पर्यटन के लिए*

*बागेश्वर में सरयू कॉरिडोर और सरयू उद्गम स्थल के विकास को मिली मंजूरी*

*देवप्रयाग सहित सभी प्रयागों व घाटों में भव्य आरती और नए घाटों के विकास के निर्देश*

*योग, साहसिक पर्यटन और वन्यजीव गतिविधियों से उत्तराखंड को वर्षभर पर्यटन गंतव्य बनाने की तैयारी*

मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में शीतकालीन यात्रा को प्रोत्साहित करने के लिए स्नो लेपर्ड साइटिंग, हेली-स्कीइंग तथा हिमालयन कार रैली को तत्काल प्रारंभ करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने आगामी 20 दिसंबर तक शीतकालीन यात्रा के दृष्टिगत केएमवीएन एवं जीएमवीएन की सभी व्यवस्थाओं और सुविधाओं को दुरुस्त करने तथा होटल मालिकों के साथ बैठक आयोजित करने के निर्देश भी दिए हैं।

मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जिलों के प्रमुख पर्यटक स्थलों से संबंधित सड़क, होटल एवं अन्य बुनियादी सुविधाएं पूर्ण रूप से दुरुस्त होनी चाहिए। मुख्यमंत्री स्वयं सड़क मार्ग से यात्रा कर व्यवस्थाओं का स्थलीय निरीक्षण करेंगे। इसके साथ ही शीतकालीन यात्रा के प्रोत्साहन से जुड़े विभिन्न हितधारकों के साथ दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने “वन डिस्ट्रिक्ट–वन फेस्टिवल” के तहत राज्य के प्रत्येक जनपद में एक-एक भव्य महोत्सव आयोजित करने के निर्देश दिए, जो संबंधित जनपद की विशिष्ट पहचान बने। उन्होंने निर्देश दिए कि इन महोत्सवों में उस जनपद के विशिष्ट महानुभावों, प्रवासियों, ग्राम प्रधानों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। साथ ही राज्य स्तर पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का भव्य महोत्सव आयोजित करने के भी निर्देश दिए गए, जिसमें देश-विदेश से विशिष्ट व्यक्तियों और प्रवासियों को आमंत्रित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने इन आयोजनों में आम जनता की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

*मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी शनिवार देर रात्रि मुख्यमंत्री आवास में शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के संबंध में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों एवं सभी जिलों के जिलाधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर रहे थे।*

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने बागेश्वर में सरयू कॉरिडोर के विकास के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने गंगोत्री की तर्ज पर सरयू नदी के उद्गम स्थल पर धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्थल विकसित करने के निर्देश भी दिए। मुख्यमंत्री ने बागेश्वर में ट्राउट मछली, कीवी एवं लाल चावल के उत्पादन की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए इनके प्रोत्साहन पर गंभीरता से कार्य करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार, निजी संस्थानों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का भव्य योग महोत्सव आयोजित करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री श्री धामी ने निर्देश दिए कि राज्य में पर्यटन स्थलों के विकास से संबंधित कार्य योजनाओं में पर्यटकों, टूर ऑपरेटर्स, होटल व्यवसायियों एवं अन्य हितधारकों का फीडबैक सम्मिलित किया जाए, ताकि पर्यटकों की अपेक्षाओं के अनुरूप सुविधाओं का विकास किया जा सके।

बैठक में मुख्यमंत्री ने पौड़ी के पैठाणी स्थित राहु मंदिर एवं लाखामंडल मंदिर के सौंदर्यीकरण की कार्ययोजना को शीघ्र एवं प्रभावी रूप से धरातल पर उतारने के निर्देश दिए। साथ ही देवप्रयाग सहित राज्य के विभिन्न प्रयागों एवं घाटों में आयोजित आरती का संज्ञान लेते हुए निर्देश दिए कि प्रदेश के सभी प्रमुख धार्मिक प्रयागों एवं घाटों में भव्य आरती आयोजित की जाए तथा नए घाटों का भी विकास किया जाए।

बैठक में सचिव पर्यटन ने जानकारी दी कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर उत्तराखंड में शीतकालीन पर्यटन को नई दिशा देने के लिए राज्य सरकार लद्दाख मॉडल पर “स्नो लेपर्ड टूर” प्रारंभ करने जा रही है। इसके तहत शीतकाल में गंगोत्री जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्रों को नियंत्रित रूप से पर्यटकों के लिए खोला जाएगा तथा उत्तरकाशी स्थित गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में प्रायोगिक तौर पर हिम तेंदुआ पर्यटन संचालित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इस पहल का उद्देश्य शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित करना है। स्नो लेपर्ड टूर से होमस्टे, स्थानीय गाइड, साहसिक पर्यटन एवं अन्य गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

सचिव पर्यटन ने यह भी बताया कि शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य में शीतकालीन चारधाम यात्रा, साहसिक पर्यटन, सांस्कृतिक उत्सव एवं वन्यजीव पर्यटन से संबंधित एक व्यापक कार्ययोजना लागू की जा रही है। इसके अंतर्गत देश के प्रमुख शहरों में रोड शो, डिजिटल एवं प्रिंट मीडिया अभियान, गद्दी स्थलों से सायंकालीन आरती का लाइव प्रसारण, विशेष टूर पैकेज तथा शीतकाल में होटल-रिसॉर्ट्स को शुल्क में रियायत जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।

कार्ययोजना के तहत औली, खलिया टॉप, बेदनीधार सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्कीइंग, ट्रेकिंग, पैराग्लाइडिंग एवं रैपलिंग जैसे साहसिक आयोजन किए जाएंगे। मसूरी, नैनीताल एवं उत्तरकाशी में विंटर कार्निवल, ऋषिकेश में अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव तथा जिम कॉर्बेट, नंधौर एवं गंगोत्री क्षेत्र में वन्यजीव एवं स्नो लेपर्ड पर्यटन गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। सरकार का उद्देश्य उत्तराखंड को वर्षभर पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित करना है।

बैठक में प्रमुख सचिव श्री आर. के. सुधांशु, श्री पंकज कुमार पांडे, श्री शैलेश बगौली, श्री सचिन कुर्वे, श्री धीराज गब्र्याल, अपर सचिव श्री बंशीधर तिवारी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे, जबकि सभी जिलों के जिलाधिकारी वर्चुअल माध्यम से जुड़े रहे।
[14/12, 12:15 pm] +91 94101 89723: *LIVE: मदनपल्ली, आंध्र प्रदेश में आयोजित जनसभा*

आगे पढ़ें
: *LIVE: तिरूपति, आन्ध्र प्रदेश में आयोजित अटल-मोदी सुशासन यात्रा एवं जनसभा*

Next Post

विकास भवन परिसर में आयोजित किया गया बहुउद्देश्यीय विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर ।

विकास भवन परिसर में आयोजित किया गया बहुउद्देश्यीय विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर । उत्तराकाशी । – उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण,नैनीताल के तत्वावधान में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, उत्तरकाशी द्वारा विकास भवन परिसर में बहुउद्देश्यीय विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में आमजन को उनके […]

You May Like