प्रवासियों को लेकर विपक्ष के निशाने पर प्रदेश सरकार

देहरादून। उत्तराखंड में प्रवासियों के वापस लौटने के साथ ही कोरोना संक्रमण के मामलों में तेजी आ गई है। प्रवासियों के साथ कोरोना संक्रमण पहाड़ी जिलों तक भी पहुंच गया है, जहां इससे पहसे एक भी मामला सामने नहीं आया था। कांग्रेस का कहना है कि कोरोना संकट से पैदा हुई परिस्थितियों से निपटने में राज्य सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है। न संक्रमण को नियंत्रण में रखा जा पा रहा है और न ही लौट रहे प्रवासियों के लिए कोई योजना बनाई गई है। यूकेडी भी प्रवासियों को रोजगार देने के लिए नीतिगत परिवर्तन की मांग कर रहा है। अल्मोड़ा और उत्तरकाशी में घर लौटे प्रवासियों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद नैनीताल हाईकोर्ट ने इस बारे में सरकार से जवाब तलब किया है। दूसरी तरफ इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार की गलती की वजह से गांवों का माहौल खराब हो रहा है। आपसी सौहार्द बिगड़ रहा है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि मुख्यमंत्री के लौटने वाले प्रवासियों में से 25,000 लोगों के कोरोना संक्रमित होने के बयान ने आग में घी का काम किया है। जो लोग मजबूरी में, जान बचाने के लिए अपने घर लौट रहे हैं। गांववाले उन्हें दुश्मनी की नजर से देखने लगे हैं, कई जगह मारपीट की नौबत आ गई है। इससे बचा जा सकता था अगर सरकार इन लोगों को सीधे घर भेजने के बजाय मैदानी क्षेत्रों में ही होम क्वारंटाइन करती। .धस्माना कहते हैं कि यह कहना गलत है कि दो-सवा दो लाख लोगों को क्वारंटाइन करने की क्षमता नहीं है। साल भर में कई बार धार्मिक स्नान के आयोजन में लाखों लोग हरिद्वार में इकट्ठे होते हैं, कुंभ में करोड़ों लोग आते हैं.। इन सबको उत्तराखंड रखता है। सरकार चाहती तो हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, देहरादून-नैनीताल के मैदानी इलाकों में सैकड़ों होटलों, धर्मशालाओं में इंस्टीट्यूशनल क्वारंटाइन सेंटर बनाकर लोगों को रुकवा सकती थी। क्वारंटाइन किए जाने की अवधि पूरी कर लोग गांव जाते तो उनका स्वागत होता, उन्हें भगाया नहीं जाता।
गांवों में इतने संसाधन भी नहीं हैं कि वहां पहुंच रहे लोगों को क्वारंटाइन किया जा सके. सरकार ने ग्राम प्रधानों को इसकी जिम्मेदारी दे दी है। लेकिन प्रदेश भर में ग्राम प्रधान कह रहे हैं कि उनके पास प्रवासियों को क्वारंटाइन करने की क्षमता नहीं है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा और बढ़ गया है, क्योंकि बाहर से आए कई लोग सोशल डिस्टेंसिंग भी नहीं रख रहे हैं। इसके अलावा बड़ा संकट वापस लौट रहे लोगों के रोजगार का है। धस्माना कहते हैं कि लौटने वाले लोग वो हैं जिनके पास लॉकडाउन के 35-40 दिनों में ही जमा-पूंजी खत्म हो गई और उनके अस्तित्व का संकट आ गया। अब सरकार को देखना है कि इन लोगों की जो स्किल है उसके अनुरूप उन्हें रोजगार दे पाए और गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क की पहुंच सुनिश्चित करे। पूर्व आईएएस और यूकेडी नेता एसएस पांगती कहते हैं कि सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों में बहुत गुंजाइश नहीं है। सरकार को रोजगार सृजन के दूसरे उपायों पर सोचना होगा। पांगती कहते हैं कि खनन रोजगार का एक बड़ा जरिया साबित हो सकता है लेकिन इसके लिए सरकार को नीतियों में परिवर्तन करना होगा। पांगती कहते हैं कि अब भी खनन के पट्टे बड़े कारोबारियों को ही दिए जाते हैं जो माफिया की तरह काम करते हैं। सरकार को स्थानीय गांवों को खनन की अनुमति देनी चाहिए.। उत्तराखंड में जितनी नदियां, गाड़-गदेरे हैं उनसे बड़ी मात्रा में रेत-बजरी निकालने के काम में लाखों लोगों को रोजगार मिल जाएगा। लोगों का अपने क्षेत्र से लगाव होता है तो वो बेतरतीब खनन कर के अपनी नदी को नुकसान भी नहीं पहुंचाएंगे।

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