इलाहाबाद हाईकोर्ट मुकदमे में पेशी के दौरान इंदिरा के सम्मान में कोई भी अपनी जगह से खड़ा नहीं हुआ था, उसी का फैसला आने के बाद मुश्किलों में घिरने की वजह से इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की रात से देश में इमरजेंसी लगाए जाने की सिफारिश कर दी ,इस सिफारिश को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने मंजूरी देते हुए देश में इमरजेंसी का एलान कर दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट मुकदमे में पेशी के दौरान इंदिरा के सम्मान में कोई भी अपनी जगह से खड़ा नहीं हुआ था, उसी का फैसला आने के बाद मुश्किलों में घिरने की वजह से इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की रात से देश में इमरजेंसी लगाए जाने की सिफारिश कर दी ,इस सिफारिश को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने मंजूरी देते हुए देश में इमरजेंसी का एलान कर दिया

इंदिरा गांधी को झेलना पड़ा इमरजेंसी लागू करने का खामियाजा, किसी ने नहीं किया सम्मान

लखनऊ /देहरादून। देश की सबसे ताकतवर महिला में शुमार भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी को देश में इमरजेंसी लागू करने का खामियाजा भुगतना पड़ा था। उनको अपनी जन्मस्थली इलाहाबाद में भी इसके कारण काफी विरोध झेलना पड़ा और तो और लोग आगमन पर उनके सम्मान में खड़े तक नहीं हुए।


देश में आज आपातकाल दिवस मनाया जा रहा है। इसके बीच में स्वर्गीय इंदिरा गांधी की चारों तरफ चर्चा भी हो रही है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की चुनिंदा ताकतवर हस्तियों में शुमार किया जाता था। इसके बाद भी आज से करीब 43 वर्ष पहले एक ऐसा दिन भी रहा, जब प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ऐसी जगह पहुंची, जहां सौ से ज्यादा लोग कुर्सियों पर बैठे हुए थे, लेकिन इंदिरा के पहुंचने पर कोई भी उनके सम्मान में खड़ा नहीं हुआ। इतना ही नहीं करीब पांच घंटे बिताने के बाद इंदिरा जब वहां से वापस जाने लगीं, तब भी कोई अपनी जगह से नहीं हिला। इंदिरा गांधी को यह बात इस कदर नागवार गुजरी थी कि देश में इमरजेंसी लागू करने के उनके फैसले में यह भी एक बड़ी वजह बना था। इंदिरा गांधी ने बाद में इस प्रकरण का अपने कुछ करीबियों से इसका जिक्र भी किया था।
 क्या था मामला

तारीख- 18 मार्च 1975, दिन- मंगलवार, वक्त- सुबह करीब साढ़े दस बजे, जगह- इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्ट नंबर पंद्रह। कोर्टरूम खचाखच भरा हुआ था। सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम थे। कोर्ट रूम में सिर्फ पास वालों को ही एंट्री दी जा रही थी। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा चैंबर से कोर्ट में आए, तो वहां मौजूद सभी लोग उनके सम्मान में अपनी जगह पर खड़े हो गए। उनके दाहिनी तरफ के गेट पर मेटल डिटेक्टर लगा हुआ था। कुछ ही पल बाद देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मेटल डिक्टेक्टर से गुजरते हुए कोर्ट रूम में दाखिल हुईं। उन्होंने पहले हाथ जोड़े और सिर को झुकाकर जस्टिस सिन्हा का अभिवादन किया, फिर सामने की तरफ नजर उठाई। कोर्ट रूम में जस्टिस सिन्हा के सामने तकरीबन डेढ़ सौ लोग कुर्सियों पर बैठे थे, लेकिन उस दौर में बेहद ताकतवर समझी जाने वाली पीएम के पहुंचने पर भी कोई अपनी जगह से नहीं हिला।
इंदिरा गांधी के वकील एससी खरे ने अपनी जगह से हिलने की कोशिश जरूर की, लेकिन पूरी तरह खड़े होने की हिम्मत वह भी नहीं जुटा सके। कोर्ट का यह नजारा देखकर इंदिरा हैरत में पड़ गईं। इसके बाद कोर्ट अर्दली ने उन्हें कटघरे में आने का इशारा किया। इंदिरा गांधी कटघरे में कुछ देर यूं ही खड़ी रहीं, फिर उनके वकील की गुजारिश पर जस्टिस सिन्हा ने उन्हें कटघरे में एक कुर्सी मुहैया करा दी और बैठे-बैठे ही जवाब देने की इजाजत भी दे दी

कोर्टरूम में पहले जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी से कुछ सवाल पूछे। इसके बाद 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव हारने और कोर्ट में मुकदमा दाखिल करने वाले राज नारायण के वकील शांति भूषण ने इंदिरा से सवाल करने की इजाजत मांगी, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया। शांति भूषण ने इंदिरा से पूरे चार घंटे और बीस मिनट तक सवाल दागे। ज़्यादातर सवालों के जवाब खुद इंदिरा गांधी ने ही दिया, जबकि कुछ मामलों में उनके वकील एससी खरे ने आपत्ति जताई और इंदिरा की तरफ से उन्होंने ही बातें रखीं। इस दौरान कोर्ट रूम में इंदिरा गांधी करीब पांच घंटे तक रहीं, लेकिन उनके वकील को छोड़कर इस दौरान कोई भी उनके पास नहीं गया।
शांति भूषण के तीखे सवालों से इंदिरा कई बार नर्वस भी हुईं, लेकिन ज्यादातर सवालों का उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। मौसम उस दिन हल्का गुलाबी था। सुबह हुई हल्की बूंदाबांदी के बाद आसमान में बादल छाए हुए थे और ठंडी हवाएं माहौल में गुलाबी रंग भर रहीं थीं। इसके बावजूद इंदिरा के माथे पर कई बार पसीने की बूंदें थीं। तीन- चार बार तो उन्हें रुमाल का सहारा भी लेना पड़ा। कोर्ट रूम में उन्होंने कई बार पानी भी पी लिया था।

करीब पांच घंटे बाद इंदिरा गांधी जब वापस जाने लगीं, तब भी कोर्ट रूम में मौजूद कोई भी शख्स अपनी जगह से खड़ा नहीं हुआ। वकील एससी खरे इस बार जरूर उनके साथ बाहर निकले। कोर्टरूम के बाहर तमाम लोग इंदिरा से मिलने के लिए खड़े हुए थे। कई लोग तो पिछले पांच घंटों से इंतजार कर रहे थे, लेकिन कोर्टरूम में लोगों के रवैये से हैरान इंदिरा किसी से भी नहीं मिलीं और सीढिय़ां उतरने के बाद सीधे अपनी कार में जा बैठीं। दरअसल इंदिरा गांधी इस अदालत में एक आरोपी के तौर पर पेश हुई थीं। इसके लिए अदालत ने उन्हें बाकायदा समन जारी किया था।
अदालत क्यों आईं थीं इंदिरा

देश में 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस ने काफी बड़ी जीत हासिल की थी। इंदिरा ने खुद रायबरेली सीट से विपक्ष के उस वक्त के बड़े नेताओं में शुमार राज नारायण को एक लाख 11 वोट से हराया था। इस चुनाव में राज नारायण ओवर कांफिडेंस का शिकार हो गए थे और नतीजे आने से पहले ही उन्होंने विजय जुलूस तक निकाल डाला था, लेकिन रायबरेली की इस सीट पर एक लाख से ज्यादा वोटों से हारने के बाद राज नारायण ने इंदिरा पर सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करने, वोटरों को खरीदने और चुनाव में धांधली कराने का आरोप लगाया। नतीजे जारी होने के कुछ दिनों बाद राज नारायण ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक अर्जी भी दाखिल की और अदालत से उन्हें अयोग्य घोषित किये जाने की मांग की। राज नारायण ने यह चुनाव याचिका 15 जुलाई 1971 को दाखिल की थी।

इस अर्जी पर सबसे पहले जस्टिस लोकुर ने सुनवाई की थी। बाद में यह मामला जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की बेंच में ट्रांसफर हो गया था। करीब साढ़े तीन वर्ष तक चली सुनवाई के बाद जस्टिस सिन्हा ने जब राज नारायण के लगाए गए तमाम आरोपों को सच के करीब पाया तो उन्होंने प्रतिवादी बनाई गई तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को समन जारी कर उन्हें 18 मार्च 1975 को कोर्ट में तलब कर लिया। भारत के इतिहास में यह पहला मौका था, जब किसी प्रधानमंत्री को अदालत ने समन जारी किया और उसे कोर्ट में पेश होना पड़ा।
तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की पेशी के बाद अदालत ने दो और तारीखों पर सुनवाई के बाद मई महीने में अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया था और फैसला सुनाने को 12 जून 1975 की तारीख तय की थी। 12 जून को फैसले में जस्टिस सिन्हा की बेंच ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को न सिर्फ रद कर उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था, बल्कि अगले छह वर्ष तक उनके चुनाव लडऩे पर पाबंदी भी लगा दी थी। इसी दिन आए गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे भी इंदिरा गांधी के खिलाफ गए थे।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करने पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी उन्हें पूरी तरह राहत नहीं दी थी। जिस मुकदमे में पेशी के दौरान इंदिरा के सम्मान में कोई भी अपनी जगह से खड़ा नहीं हुआ था, उसी का फैसला आने के बाद मुश्किलों में घिरने की वजह से इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की रात से देश में इमरजेंसी लगाए जाने की सिफारिश कर दी थी। इंदिरा की इस सिफारिश को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने मंजूरी देते हुए देश में इमरजेंसी का एलान कर दिया।

राज नारायण के दाखिल मुकदमे का फैसला अगर इमरजेंसी लगने की सबसे बड़ी वजह बना था तो साथ ही उसी वर्ष 18 मार्च को इंदिरा गांधी की पेशी के दौरान किसी का अपनी जगह से खड़ा न होना भी एक वजह था, क्योंकि इंदिरा को यह बात काफी बुरी और बेहद नागवार गुजरी थी।( अचला)

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