महाभारत* की आधारशिला “*द्रौपदी स्वयंवर*”

*महाभारत* की
आधारशिला “*द्रौपदी स्वयंवर*”

रोज पढियेगा आखिर तक

द्रुपद की राजधानी कांपील्य नगर में आकाश के स्पर्श को आतुर स्वर्ण घटित शिखरों वाले महल आपाद मस्तक घृत-वर्तिका से सजे स्वर्ण-रजत दीप पात्रों से शोभित थे। ऐसे पात्र जिनमें स्वर्ण रजत नलिकाओं द्वारा ही निरंतर घृत पूरित रखने का प्रबंध था। स्वयंवर मुहूर्त के एक सप्ताह पूर्व से ही आयोजित थी यह दीपावली। घर घर में दीपावली सजी थी। राज प्रसाद के सामने के विस्तृत मैदान यंत्र चालित हवाओं से सज्जित थे। नगर सजा था। पंचाली के आसन्न स्वयंवर के लिए। स्वयंवरा बनने वाली थी द्रोपदी। बड़ी कड़ी शर्त द्रुपद की। महल के समक्ष निर्मित यज्ञ मंडप के मध्य एक कृत्रिम सरोवर निर्मित था। उसके ठीक ऊपर टंगा था काष्ट-निर्मित यंत्र, जो लगातार किसी कृत्रिम प्रक्रिया से द्रुत गति से चलायमान किया जा रहा था। यंत्र के ठीक मध्य जड़ित था काष्ट निर्मित सुंदर मीन। यंत्र के साथ ही यह मछली भी लगातार तीव्र गति से चलायमान हो रही थी। इस मोहक किंतु कृत्रिम मीन की आंखें अपेक्षा से कुछ अधिक छोटी ही थी। इन आंखों में से दाहिनी आंख को जो धनुर्धारी एक ही बाण से बेध देगा उसी की हो जाएगी पद्मगंधा पांचाली। धनुर्धारी को इस नन्ही आंख को निशाना बनाने के लिए ऊपर नहीं नीचे देखना था। सरोवर में पढ़ते उसके प्रतिबिंब को लक्षित कर।

स्वयंबर के दिन दूर-दूर से आए राजाओं की पंक्ति सजी थी । बलराम और श्रीकृष्ण तो इस समारोह के मुख्य अतिथि ही थे। सभा में बलराम श्रीकृष्ण पहले से ही आ बिराजे थे। उनके पाश्व में ही द्रुपद भी थे। उनका पुत्र धृष्टद्युम्न भी पास खड़ा था। सामने के स्वर्ण आसन भरने लगे। सर्वप्रथम दुर्योधन ही अपने अभिन्न मित्र कर्ण के साथ मंडप में उपस्थित हुआ। फिर अन्य नराधिपतियों का आगमन आरंभ हुआ। वाराणसी, मिथिला, कलिंग, कम्भोज, कर्नाटक, द्रवीण प्रदेश, गुर्जर प्रदेश, मालवा, सिंध, पंचनद आदि के नरेश एवं धनुर्धर एक-एक कर आसन ग्रहण करते गए। जैसे ही कोई नृप या धनुर्धर आसन ग्रहण करता, उसके साथ आए चारण उसके राज्य शौर्य और कुल वंश की प्रशंसा के पुल बांध किनारे हो जाते। द्रोपदी एक बात का अनुभव करने से वंचित नहीं रह पाई। दुर्योधन के साथ ही आए और उसके पास में बैठे एक तेजस्वी युवक का परिचय तो उसके विरुदावली गायकों ने महान धनुर्धारी, अंगनरेश के रूप में दिया पर उसके कुल गोत्र पर किसी ने प्रकाश नहीं डाला। उसने धीरे से अपने अग्रज से इसका कारण पूछा-वह तेजस्वी युवक सूत-पुत्र कर्ण था। इसका यहां आने का साहस कैसा हुआ। “हंसों के मध्य में बगुला।” पांचाली की त्योरियां चढ़ गई। बात केवल धृष्टद्युम्न को ही सुना कर कही गई थी, पर वह पास बैठे कृष्ण तक भी पहुंच गई। और उनके मन के कमल खिल उठे। अभी तक जितने योद्धा उपस्थित थे उनमें कर्ण ही यह दुष्कर कार्य संपन्न करने में समर्थ था। उन्हें पता था पांडव अर्जुन के साथ किसी भी क्षण पहुंच सकते हैं। और वह क्षण आ ही गया जिसकी श्रीकृष्ण को आतुरता से प्रतीक्षा थी।

सभा मंडप के दूसरे किनारे पांच ब्रह्मचारी खड़े थे। श्रीकृष्ण आस्वस्त हो गए। पांचाली को अब पार्थ का ही होना था ।
द्रुपद की इंगित पर श्रीकृष्ण ने सभा के संचालन का भार संभाला, और सभी को संबोधित करते हुए, खड़ा होकर बोले। स्वयंवर सभा में उपस्थित देव, दानव और मानव वीरों आप चौंकिए नहीं। मैं जानता हूं कि इस पद्मगंधा पांचाली के पाणीग्रहण को आतुर सभी लोकों के अधिपति यहां उपस्थित हैं। मैं आप सभी को पहचान गया हूं। इस स्वयंवर की एक शर्त है। मंडप के मध्य बने उस सरोवर में एक कृत्रिम काष्ट यंत्र द्वारा चालित मछली प्रतिबिंबित हो रही है। और साथ ही उसकी दो छोटी पर सुंदर आंखें। नृप द्रुपद ने यह शर्त रख दी है कि जो प्रतिबिंब को ही आलोकित कर इस मीन की दाहिनी आंख को अपने सर का अचूक निशाना बना लेगा, पद्मगंधा पांचाली अपने हाथ में पड़े पद्ममाला उसी के गले में डाल उसे धन्य कर देगी। उसका सौभाग्य सूर्य उदित हो आएगा। क्योंकि साधारण नहीं है यह श्याम-वर्णा याज्ञसैनी। मैंने योगिक शक्तियों का कुछ विकास कर लिया है। जिस किसी का भी वरण करेगी यह अपरूप रूप की धनि राजकन्या, संपूर्ण आर्यावर्त का वैभव उसके चरणों पर लोटेगा। चक्रवर्ती सम्राट होगा वह। और अगर देव, यक्ष, गंधर्व में से कोई ले गया इसे , तो वह भी कई लोकों का अधिपति बनकर रहेगा। मैं योग बल से इतना तो जानता ही हूं कि किसी नर की ग्रीवा में ही गिरने जा रही है पांचाली की पद्ममाला। उधर देखता हूं तो बीर-बहूटीयों की सजी संवरी पंक्ति की तरह एक से एक पराक्रमी पुरुष उपस्थित हैं । इन नरश्रेष्टों में कौन याज्ञ-सेनी का हृदय जीतने में समर्थ होता है। किसके सूची-भेद सर की नोक पर चढ़कर पांचाली रूपी राजलक्ष्मी उसके चरणों पर चढ़ती है । आइए स्वयंवर को विधिवत उद्घाटित घोषित किया जाता है। आप बारी-बारी से आगे बढ़ें। यह तो निश्चय ही भाग्य का खेल है। जिसका सर सर्वप्रथम मीन के नेत्रों को विंध कर देगा मीनाक्षी- पांचाली भी उसकी हो जाएगी। मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं। आप अपना कार्य आरंभ कीजिए। इतना कहकर श्रीकृष्ण ने अपना आसन ग्रहण कर लिया।

सर्वप्रथम दृढ़धन्वा ने अपने भाग्य की परीक्षा का साहस जुटाया। वह मस्त गजराज की चाल से समस्त उपस्थित वीरों पर एक अहंकारपूर्ण दृष्टि निक्षेप करता हुआ पाषाण निर्मित सरोवर की ओर बढ़ा। पार्श्व की ही एक वेदी पर एक विशाल धनुष ररखा था। और रखे थे कई तर्कशों से भरे भांति भांति के सर। पर कोई सर संधान तो तब करें जब वह उस विशाल धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सके। सर्वप्रथम तो उसने एक हाथ से ही उसे उछाल लेना चाहा। पर जब उस विशाल धनुष ने अपने स्थान से हिलने का नाम तक नहीं लिया तो दृढधन्वा ने दोनों हाथ लगा दिए। उसने अपने सुगठित एवं बलशाली शरीर की संपूर्ण शक्ति को अपनी भुजाओं में समेटी, और किसी विशाल भुजंग की तरह ही धनुष को उस में लपेट भूमि से उसका संबंध विच्छेद करना चाहा। इस क्रम में धनुष का तो कुछ नहीं बिगड़ा पर दृढधन्वा के फेफड़े अवश्य फटने फटने को हो आए। एक ललचाई किंतु विवश दृष्टि उसने पांचाली की ओर डाली, और अपनी पराजय स्वीकार कर अपने स्थान की ओर लौट आया। दृढधन्वा की दुर्दशा के पश्चात अधिकांश योद्धा हिम्मत खो बैठे, फिर भी कुछ अपने इष्टदेव का स्मरण कर उस सजल किंतु हृदयहीन पाषाणी सरोवर तक जाकर धनुष को उठाने का प्रयास करते रहे, जिनमें चेदिराज शिशुपाल व मगधनरेश महाबली जरासंध भी उल्टे पैर लौट आए। तभी उठा दुर्योधन। उसके अनेक अनुजों और उसके अभिन्न मित्र अंगराज-कर्ण ने उसकी हिम्मत बढ़ाने के लिए जोर से जयघोष किया । हस्तिनापुर अधिपति यशस्वी महाराज धृतराष्ट्र के सुपुत्र दुर्योधन जयतु-जयतु। जयघोष से प्रफुल्लित दुर्योधन के चरण वेग से सरोवर की ओर बढ़े , और बात की बात में वहां पहुंच कर उसने सब के देखते ही किसी फूल की तरह ही उस विशाल धनुष को हाथों में तोल लिया। महाराज द्रुपद और धृष्टद्युम्न के होठों की लौटी मुस्कान वापस आ गई। पर पांचाली के मुख का प्रकाश सहसा बुझ गया। इस बिलासी कौरव की कहानी उस तक बहुत पहले पहुंच चुकी थी। वह उसे लक्ष्य भेद से रोक भी नहीं सकती थी। पांचाली कुछ बोल तो नहीं सकी पर मन ही मन अपनी इष्ट-देवी का स्मरण किया । हे जगजन्नी,…. हे मां,…. कुछ ऐसा करो कि मुझे इस दुराचारी, मध्य्पाई, अहंकारी की अंकभागिनी नहीं बनना पड़े।
और सुन ली द्रोपदी की इष्ट-देवी ने उसकी प्रार्थना को। पहले ही सर के काष्ट यंत्र से टकराकर चूर चूर होते ही वह क्रोधाभिभूत हो एक पर एक कई बाण मछली की ओर फेंकता गया। पर सब का परिणाम एक ही हुआ। मछली के किसी भी अंग का स्पर्श भी वे नहीं कर सके। अपमान से भर कर उसने धनुष को उसकी वेदी पर उछाल दिया और अपने स्वर्ण आसन पर वापस आ गया।

पांचाली के मुख पर प्रकाश लौट आए। श्रीकृष्ण के होंठों पर भी एक स्मृति खेली। चलो एक पारिजात पुष्प किसी व्यभिचारी की गंदी झोली में गिरते-गिरते रहा। पर पांचाली की पीड़ा दूसरे ही क्षण वापस आ गई। कौन सा खेल खेल रही थी नियति उसके साथ। दुर्योधन के अपमान से आग की तरह ही प्रज्वलित तन लिए वह व्यक्ति जो द्रुत गति से सरोवर की ओर बढ़ रहा था, वह तो वही था जिसका परिचय महा धनुर्धारी सूत-पुत्र कर्ण के रूप में उसे दिया गया था। यह तो अवश्य लक्ष्य भेद करेगा ही। तो क्या एक राजकुमारी किसी सारथी पुत्र की शैय्याभगिनी होने को विवश होगी। “आहा” ! वह तो मत्त सिंह सा सीधे बेदी की ओर ही बड़ा जा रहा था। और लो उसने एक हाथ से ही धनुष को किसी नन्हे कंदूक की तरह ही उठा लिया और इसके पूर्व ही पांचाली पलक भी झपका पाए इसने उस पर प्रत्यंचा भी चढ़ा डाली। और अब ? अब तो….. तरकश से उसने एक विचित्र बाण खींचा है। “सूची- भेद” सर है यह। द्रोपदी इसे खूब पहचानती है। खूब ज्ञान है इस वीर को कि किस कार्य के लिए किस सर का प्रयोग हो सकता है। पांचाली को विश्वास हो गया। लक्ष्य भेद कर छोड़ेगा यह महान धनुर्धर। “नहीं”……… ! द्रोपदी जोर से चीखी। दुर्योधन के शर संधान के समय जिव्हा पर जो लगाम उसने दे रखी थी, वह अनजाने ढीली पड़ गई।………. ।

साभार(शेष आगे )

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