सरकारी कर्मचारी ,सरकारी योजनाएं और समाज में भर्ष्टाचार से कोड़ में खाज पैदा करतें हैं

सरकारी कर्मचारी ,सरकारी योजनाएं और समाज – मोतियाबिंद बढ़ रहा है
(मदन पैन्यूली)
किसी एक दिन एक गाँव की तरफ गया था । देखा कि बरसों से वीरान पड़े खेतों में दर्जनों गड्ढे खुदे हुए हैं । खेतों में इतने सारे गड्ढों का होना अजीब सा लगा तो दरियाप्त करने पर पता चला कि मनरेगा योजना के तहत भूमिगत जल के स्तर में वृद्धि करने हेतु वर्षाजल संग्रहण के लिए ये गड्ढे खोदे गए हैं ।

जन प्रतिनिधियों का कुशल नेतृत्व ,फाइलों पर सरकारी अधिकारियों की सुन्दर योजना , जमीन पर सरकारी कर्मचारियों और जनता का सराहनीय तालमेल और नतीजा खेत में गड्ढे ही गड्ढे । इन खेतों में बरसों से हल ही नहीं चला है, आधे से ज्यादा गाँव विकास देवता की बलि चढ़ उजाड़ हो चुका है l तो अब जो वर्षा जल संग्रहण होगा वो निसंदेह सरकारी फाइलों और आंकड़ों को सींचने के लिए ही हो सकता है, ऐसा मेरा अनुमान है l

यह तो सिर्फ एक उदाहरण भर है । ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जो होते हुए भी किसी को दिखाई नहीं देते । तंत्र की आँखों में जो मोतियाबिंद अंग्रेजी राज में शुरू था वह अब पूर्ण अंधता की हद तक बढ़ जो गया है ।

अंग्रेजों ने जो शासन तंत्र ( अधिकारी -कर्मचारी -नियम -कानून -संस्थाएं आदि ) बनाया ,उसकी वफादारी आमजन के प्रति न होकर सत्ता ( तब ब्रिटिश सरकार ) के प्रति निश्चित कर दी गयी थी । आजादी के बाद के कुछ दशकों तक इस तंत्र पर इसलिए थोड़ा बहुत नियंत्रण रह पाया क्योंकि तब गाँव -शहर के स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर देहरादून -दिल्ली तक के जन प्रतिनिधियों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल थे जो गांधी -जयप्रकाश -बिनोबा जैसे दार्शनिक – विचारकर्मियों से प्रभावित थे । सो तंत्र पर पूरा तो नहीं पर एक हद तक लगाम लगी ही रही । न चाहते हुए भी तंत्र जनता के प्रति जबाबदेह बनने को बाध्य रहा ।

सन 90 के दशक के बाद से ठेकेदार -व्यापार-मुनाफा -कमीशन के आधुनिक विकासवादी दर्शन से प्रभावित पीढ़ी के लोगों के हर स्तर पर जन प्रतिनिधि बनने की जो प्रक्रिया शुरू हुई उससे न सिर्फ सरकारी तंत्र अपनी पुरानी राह पर चल पड़ा बल्कि कोढ़ में खाज की तरह भ्रष्टाचार (बिना मेहनत के पैसा कमाना ) समाज के निचले स्तर तक पहुंचने लगा ।

मजे की बात तो यह है कि आजादी के बाद से अब तक जो सरकारें बनी , शायद ही ऐसी कोई विचारधारा या कोई दल हो ,जो सत्ता में प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से शामिल न रहा हो । पर अंग्रेजों के बनाये तंत्र और नियमों को बदलने -सुधारने का साहस किसी ने नहीं किया ।

नतीजा , जो मोतियाबिंद कभी सत्ता के शिखर तक ही सीमित था अब बुनियाद तक फैल गया है । भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हो गयी हैं ,फ़ैल भी चुकी हैं । अंग्रेजी तंत्र के पुरखे बहुत खुश हैं अपनी लायक संतानों को देख आषीश दे रहें हैं ।

किसी को कुछ नहीं दिखता । मेरी नजर भी तो कमजोर होती जा रही है ।
( सआभार)

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